हिंसा की आग में सुलग रहा मेवात, कभी भाईचारे के लिए दी जाती थी मिसाल, जानें इसका इतिहास
Mewat : हरियाणा का मेवात एक ऐसा जिला जो पिछले 2-3 दिनों से सुर्खियों में बना हुआ है। जिले की सांप्रदायिक हिंसा ने पूरे राज्य को हिला कर रख दिया। लेकिन क्या आपको पता है गुरुग्राम से सटे मेवात देश के सबसे पिछड़े जिलों में से एक है।लेकिन आखिर क्या है मेवात का इतिहास?
2016 में बदल दिया गया था नाम
देश की राजधानी दिल्ली से महज डेढ़ घंटे की दूरी पर एक जिला मेवात सांप्रदायिक हिंसा में जल रहा है। सोमवार शाम को यहां दो समुदायों में टकराव हो गया। ये टकराव बाद में हिंसा में बदल गया।लेकिन ये हिंसा नूंह हिंसा के नाम से जानी जा रही है दरअसल, नूंह को ही कभी मेवात जिले के नाम से जाना जाता था। लेकिन 2016 में इसका नाम बदल दिया गया। ये जिला लगभग 1900 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैला हुआ है। 2011 की जनगणना के मुताबिक, यहां की आबादी 10.89 लाख है। इस आबादी में 80 फीसदी मुस्लिम है। वहीं 20 फीसदी की आबादी हिंदू की है।
सबसे पिछड़े राज्यों में से एक मेवात
राज्य के पिछड़ेपन का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यहां की साक्षरता दर 55 फीसदी भी नहीं है। पुरुष और महिलाओं की साक्षरता दर में दोगुना अंतर है। पुरुषों की साक्षरता दर जहां 70 फीसदी है तो वहीं महिलाओं की 37 फीसदी भी नहीं है। यहां की ज्यादातर अर्थव्यवस्था खेती-किसानी पर ही केंद्रित है। इसके अलावा पशुपालन और डेयरी भी यहां के लोगों की आय का बड़ा स्रोत है। ऐसा माना जाता है कि यहां दूध की पैदावार कम नहीं है, लेकिन यहां के किसानों पर इतना कर्ज है कि वो कम कीमत पर दूध बेचने को मजबूर हैं।
गौरक्षक बड़े पैमाने पर एक्टिव
मेवात इलाके में गौरक्षक भी बड़े पैमाने पर एक्टिव हैं। मेवात में हरियाणा और राजस्थान के इलाके शामिल हैं। ये इलाका राजस्थान के अलवर और भरतपुर से लेकर हरियाणा के नूंह, पलवल, फरीदाबाद और गुरुग्राम तक फैला है। इसी लिए आज देख रहें होगें की इन दिनों राजस्थान में नूंह हिंसा के बाद अलर्ट जारी किया गया है।
मुगलों के समय का है इतिहास
वहीं अगर मेवात के इतिहास की बात करें तो यहां का इतिहास मुगलों के समय का है। साल 1372 में फिरोज शाह तुगलत ने मेवात का शासन राजा नहर खान मेवाती को सौंप दिया था। राजा नहर खान ने ही मेवाती शासकों को 'वली-ए-मेवाती' उपाधि दी थी। उनके वंशज 1527 तक इसी उपाधि का इस्तेमाल करते रहे। मेवात एक समय स्वतंत्र राज्य हुआ करता था। लेकिन ब्रिटिश शासन में ये अलवर और भरतपुर रियासत में आ गया। 1857 के विद्रोह के बाद ये पूरा इलाका अंग्रेजों के अधीन हो गया।
भाईचारे के लिए जाना जाता था मेवात
मेवात आपसी भाईचारे के लिए जाना जाता था। लेकिन 1920 के दशक में मोहम्मद इलियास की अगुवाई में यहां एक आंदोलन शुरू हुआ। इसने बंटवारे का समर्थन किया।बंटवारे के बाद यहां भयानक हिंसा देखने को मिली। 1947 के बाद अलवर और भरतपुर के हजारों की संख्या में मुस्लिम विस्थापित हुए। कुछ गुड़गांव आ गए तो कुछ पाकिस्तान चले गए। ऐसा कहा जाता है कि उस समय महात्मा गांधी ने भी इस इलाके का दौरा किया था और मुस्लिमों से देश ने छोड़ने की अपील की थी।
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