भारत-कनाडा के रिश्तों में पड़ी दरार! जानिए क्या है खालिस्तान, भिंडरावाला से इसका कनेक्शन?
Khalistan Movement and India-Canada Relations: कनाडा ने खालिस्तानी आतंकवादी हरदीप सिंह की हत्या में भारत की संलिप्तता का आरोप लगाते हुए सोमवार को एक वरिष्ठ भारतीय राजनयिक को निष्कासित करने का आदेश दिया। कनाडा की इस कार्रवाई के जवाब में भारत ने भी कनाडा के एक वरिष्ठ राजनयिक को देश से निकाल दिया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, कनाडा के उच्चायुक्त को आज सुबह भारत सरकार ने तलब किया है। वहीं कनाडा के एक वरिष्ठ राजनयिक को भारत से निष्कासित करने की जानकारी दी गई। निष्कासित राजनयिक को अगले पांच दिनों के भीतर भारत छोड़ने को कहा गया है। मोदी सरकार की यह कार्रवाई कनाडा के राजनयिकों के भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप और भारत विरोधी गतिविधियों में उनकी संलिप्तता पर भारत सरकार की बढ़ती चिंता को र्शाती है। इस घटनाक्रम से साफ दिख रहा है भारत और कनाडा के रिश्तों में खटास आ रही है।
भारत ने कनाडा के आरोप को खारिज कर दिया
कनाडा ने जून 2023 में खालिस्तानी आतंकवादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में भारत पर शामिल होने का आरोप लगाते हुए एक शीर्ष भारतीय राजनयिक को कनाडा से निष्कासित कर दिया था। हालांकि, भारत सरकार ने कनाडा के इस आरोप को पूरी तरह से खारिज कर दिया है और कहा है कि भारतीय की संलिप्तता के आरोप कनाडा में हिंसा की कोई भी कार्रवाई सरकार बेतुकी और प्रेरित है।
हरदीप सिंह निज्जर को भारत की सुरक्षा एजेंसियों ने भगोड़ा और आतंकवादी घोषित कर दिया था। इसके अलावा राष्ट्रीय जांच एजेंसी की ओर से निज्जर पर 10 लाख रुपये का इनाम घोषित किया गया था। जून 2020 में कनाडा के सरे में निज्जर की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।
खालिस्तान की मांग पहली बार कब उठी?
खालिस्तान शब्द पहली बार 1940 में सामने आया था। डॉ. वीर सिंह भट्टी ने मुस्लिम लीग के लाहौर घोषणापत्र के जवाब में एक पुस्तिका में इसका इस्तेमाल किया था। इसके बाद 1966 में भाषाई आधार पर पंजाब के 'पुनर्गठन' से पहले 60 के दशक के मध्य में अकाली नेताओं ने सबसे पहले सिखों के लिए स्वायत्तता का मुद्दा उठाया था।
70 के दशक की शुरुआत में चरण सिंह पंछी और डॉ. जगजीत सिंह चौहान ने पहली बार खालिस्तान की मांग की थी। डॉ. जगजीत सिंह चौहान ने 70 के दशक में ब्रिटेन को अपना ठिकाना बनाया और अमेरिका और पाकिस्तान का दौरा भी किया। 1978 में चंडीगढ़ के कुछ युवा सिखों ने खालिस्तान की मांग करते हुए दल खालसा का गठन किया।
पंजाब में बार-बार क्यों उठ रही है खालिस्तान की मांग?
खालसा शब्द अरबी शब्द खालिस से बना है, जिसका अर्थ शुद्ध होता है। गुरु गोबिंद सिंह ने 1699 में सिखों के बीच खालसा संप्रदाय की स्थापना की थी। खालिस्तान इसी खालसा से बना है और इसका मतलब खालसा का शासन है। आजादी से पहले 1929 के लाहौर अधिवेशन में कांग्रेस ने पूर्ण आजादी की मांग का प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव का कांग्रेस के भीतर तीन नेताओं ने विरोध किया।
मोहम्मद अली जिन्ना-मुसलमानों को हिस्सा मिलना चाहिए।
मास्टर तारा सिंह-सिखों को हिस्सा मिलना चाहिए।
भीमराव अंबेडकर-दलितों को हिस्सेदारी मिलनी चाहिए और अलग चुनाव व्यवस्था बनाई जानी चाहिए।
इन तीन मांगों के बाद कांग्रेस को झटका लगा है। हालाँकि अधिवेशन में पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव पारित किया गया, लेकिन आंदोलन के दौरान भी तीनों खेमे अपनी-अपनी माँगें जोरदार ढंग से उठाते रहे थे।
खालिस्तान आंदोलन अनशन से हिंसा में कैसे बदल गया?
मास्टर तारा सिंह खालिस्तान की मांग के लिए अहिंसक आंदोलन का सहारा लेते रहे, लेकिन 1967 में उनकी मृत्यु के बाद खालिस्तान आंदोलन हिंसा में बदल गया। इसके पीछे दो बड़े कारण थे। बांग्लादेश हारने के बाद पाकिस्तान ने भारत से बदला लेने के लिए छद्म युद्ध का सहारा लिया। पाकिस्तान की ओर से चरमपंथी सिख संगठनों को फंडिंग और हथियार मुहैया कराए गए। सिख युवा धन और हथियारों के लालच से आकर्षित हुए, जिससे यह आंदोलन और अधिक तीव्र हो गया।
पंजाब के गठन के बाद वहां राजनीतिक उथल-पुथल का दौर शुरू हो गया। ज्ञानी जैल सिंह को छोड़कर कोई भी मुख्यमंत्री अपना 5 साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर सका। राजनीतिक अस्थिरता का फायदा उठाकर आंदोलन के नेताओं ने इसे हिंसक बनाना शुरू कर दिया।
अमृतसर में निरंकारियों से विवाद और भिंडरावाले का उदय
1978 में अमृतसर में अकाली दलों का निरंकार संप्रदाय से विवाद हो गया। निरंकार समुदाय के लोग जीवित गुरुओं में विश्वास करते हैं, जबकि सिख गुरु गोबिंद सिंह के बाद किसी को अपना गुरु नहीं मानते हैं। दोनों के बीच ये विवाद सालों पुराना है. लेकिन 1978 में हुए विवाद में 13 अकाली कार्यकर्ताओं की मौत हो गई। इनमें जरनैल सिंह भिंडरावाले का करीबी फौजा सिंह भी शामिल था।
यह मामला अदालत में चला और निरंकारी संप्रदाय के प्रमुख गुरुबचन सिंह को मामले से बरी कर दिया गया। इसके बाद पंजाब में भिंडरावाले के आतंक का युग शुरू हुआ। 1980 में भिंडरावाले के समर्थकों ने गुरुबचन सिंह की हत्या कर दी। जगह-जगह हिंदुओं और निरंकारी समुदाय के लोगों की हत्या की जाने लगी।
पंजाब में कानून व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो गई। चरमपंथ की मदद से सिखों के बीच पैठ बनाने के बाद भिंडरावाले ने अमृतसर के पवित्र स्वर्ण मंदिर को अपना ठिकाना बनाया। भिंडरावाले ने अकाल तख्त से ही सिखों के लिए संदेश जारी करना शुरू कर दिया। अकाल तख्त का संदेश सिख समुदाय के लिए सर्वोपरि है।
1982 में भिंडरावाले ने अकाली दल से हाथ मिलाया और धार्मिक युद्ध छेड़ दिया। भिंडरावाले और उसके समर्थक पंजाब में खालिस्तान आंदोलन के खिलाफ बोलने वाले लोगों की हत्या कर रहे थे। 1983 में जालंधर के DIG एएस अटवाल की स्वर्ण मंदिर की सीढ़ियों पर गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इसके बाद इंदिरा गांधी ने ऑपरेशन ब्लू स्टार शुरू करने का आदेश दिया।
इंदिरा, बेअंत और सेनाध्यक्ष की हत्या, हवाई जहाज उड़ा दिया गया
ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद बब्बर खालसा और अन्य आतंकी संगठन सक्रिय हो गए। ऑपरेशन के कुछ ही महीनों बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई। उनके सुरक्षा दल में शामिल दो सिख सैनिकों ने उनकी हत्या कर दी थी।
इंदिरा गांधी के अलावा 1995 में पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या कर दी गई थी। बेअंत सिंह कार से एक कार्यक्रम में जा रहे थे तभी उन पर आत्मघाती बम से हमला किया गया। 1987 में पूर्व भारतीय सेना प्रमुख जनरल एएस वैद्य की भी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।
1986 में कनाडा से लंदन होते हुए भारत आ रहे एयर इंडिया के विमान कनिष्क को उग्रवादियों ने हवा में उड़ा दिया था। इस हमले में 329 लोगों की मौत हो गई थी। हालाँकि, केंद्र और राज्य के संयुक्त अभियान के कारण पंजाब में खालिस्तान आंदोलन की मांग कम हो गई।
दुनिया
देश
कार्यक्रम
राजनीति
खेल
मनोरंजन
व्यवसाय
यात्रा
गैजेट
जुर्म
स्पेशल
मूवी मसाला
स्वास्थ्य
शिक्षा
शिकायत निवारण
Most Popular
Leave a Reply