बिहार में शाही विरासत का अंत, 96 साल की उम्र में दरभंगा राज की आखिरी महारानी कामसुंदरी का निधन
Darbhanga Raj Maharani Kamsundari Devi Passes Away: बिहार के ऐतिहासिक दरभंगा राज परिवार की आखिरी महारानी कामसुंदरी देवी का आज निधन हो गया। उन्होंने 96वर्ष की आयु में अपने दरभंगा स्थित कल्याणी निवास में आखिरी सांस ली। बताया जा रहा है कि वह पिछले कुछ महीनों से बीमार चल रही थीं उनके निधन से पूरे मिथिला क्षेत्र और बिहार में शोक की लहर दौड़ गई है, क्योंकि यह न केवल एक व्यक्तिगत हानि है, बल्कि सदियों पुरानी राजसी परंपरा के एक युग का अंत भी माना जा रहा है।
कामसुंदरी देवी का निधन
जानकारी के अनुसार, पिछले कुछ महीनों में कामसुंदरी देवी की तबीयत लगातार बिगड़ रही थी। सितंबर 2025में घर के बाथरूम में गिरने से उन्हें ब्रेन हेमरेज हुआ था, जिसके बाद दरभंगा के एक निजी अस्पताल में आईसीयू में भर्ती किया गया। परिवार के सदस्यों से मिली देखभाल के बाद वह घर लौटीं, लेकिन स्वास्थ्य में सुधार नहीं हुआ। जिसके बाद से वह लगातार अस्वस्थ रहने लगी। जिसके चलते आज सुबह कल्याणी निवास में उनका निधन हुआ। अंतिम संस्कार कल 13जनवरी को दरभंगा राज परिसर के माधेश्वर स्थान (श्यामा माई मंदिर के पास) में होगा।
कौन थी कामसुंदरी देवी?
बता दें, कामसुंदरी देवी का जन्म 1930के दशक में हुआ था और 1940के दशक में दरभंगा के आखिरी महाराजा कामेश्वर सिंह से विवाह किया। वह महाराजा की तीसरी और आखिरी पत्नी थीं, जबकि उनकी पहली पत्नी महारानी राजलक्ष्मी का निधन 1976में और दूसरी पत्नी महारानी कामेश्वरी प्रिया का निधन 1940में हो चुका था। महाराजा कामेश्वर सिंह का स्वयं 1962में देहांत हो गया था, जिसके बाद कामसुंदरी देवी ने परिवार की जिम्मेदारियां संभालीं। उनके कोई संतान नहीं थी, इसलिए उनके निधन के साथ दरभंगा राज परिवार की जीवित वंशावली समाप्त हो गई है। हालांकि, परिवार के ट्रस्ट और संपत्तियों की देखभाल अब उनके पोते युवराज कपिलेश्वर सिंह और राजेश्वर सिंह के हाथों में आएगी, जिन्हें हाल ही में एक लंबे कानूनी विवाद के बाद ट्रस्टी नामित किया गया था
कामसुंदरी देवी का जीवन राजसी वैभव से लेकर आधुनिक चुनौतियों तक फैला हुआ था। स्वतंत्र भारत में राजपरिवारों की संपत्तियां सरकार द्वारा अधिग्रहित होने के बाद उन्होंने कानूनी लड़ाइयां लड़ीं और परिवार की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने महाराजा कामेश्वर सिंह की स्मृति में 'महाराजा सर कामेश्वर सिंह कल्याणी फाउंडेशन' की स्थापना की, जिसमें 15,000 से ज्यादा पुस्तकों और दुर्लभ पांडुलिपियों वाली लाइब्रेरी शामिल है। इस फाउंडेशन के माध्यम से उन्होंने मिथिला की साहित्यिक, कलात्मक और शैक्षणिक परंपराओं को बढ़ावा दिया, साथ ही स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण के कार्यों में योगदान दिया। उनकी सादगी और जनकल्याण की भावना ने उन्हें मिथिला क्षेत्र में एक सम्मानित व्यक्तित्व बनाया।
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