सुप्रीम कोर्ट ने Paternity Leave को लेकर लिया बड़ा फैसला, कहा- साझा जिम्मेदारी वाला पालन-पोषण है जरूरी
Paternity Leave: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से देश में पितृत्व अवकाश (Paternity Leave) के लिए एक व्यापक कानून बनाने की अपील की है। अदालत ने कहा कि यह कदम लैंगिक समानता और साझा जिम्मेदारी वाले पालन-पोषण के लिए बेहद जरूरी है। कोर्ट ने माना कि शुरुआती समय में बच्चों की देखभाल में पिता की अनुपस्थिति पारंपरिक सोच को मजबूत करती है और इसका बोझ मां पर ज्यादा पड़ता है।
माता-पिता दोनों की जिम्मेदारी बराबर
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और आर. महादेवन की बेंच ने कहा कि माता-पिता दोनों की जिम्मेदारी बराबर होती है। इसलिए पितृत्व अवकाश को एक सामाजिक सुरक्षा लाभ के रूप में देखा जाना चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस अवकाश की अवधि ऐसी होनी चाहिए, जिससे माता-पिता और बच्चे दोनों को पर्याप्त समय मिल सके।
लैंगिक समानता को बढ़ावा
अदालत ने अपने फैसले में ये भी कहा कि अगर पिता को पितृत्व अवकाश नहीं मिलता है, तो वह अपने बच्चे के साथ शुरुआती समय नहीं बिता पाते। इससे बच्चे के भावनात्मक जुड़ाव और सुरक्षा पर असर पड़ सकता है। कोर्ट के अनुसार, पितृत्व अवकाश से न केवल परिवार में संतुलन बनेगा, बल्कि कार्यस्थल पर भी लैंगिक समानता को बढ़ावा मिलेगा।
सरकारी कर्मचारियों के लिए सुविधा
फिलहाल भारत में पितृत्व अवकाश केवल सरकारी कर्मचारियों के लिए लागू है, जिन्हें 15 दिन का अवकाश मिलता है। निजी क्षेत्र में ये सुविधा कंपनी की नीति पर निर्भर करती है और इसके लिए कोई एक समान कानून नहीं है। कोर्ट ने कहा कि इस व्यवस्था में बदलाव की जरूरत है।
माताओं को भी बड़ी राहत
इसी फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने गोद लेने वाली माताओं को भी बड़ी राहत दी है। अदालत ने सोशल सिक्योरिटी कोड की उस धारा को रद्द कर दिया, जिसमें केवल तीन महीने से कम उम्र के बच्चे को गोद लेने पर ही मातृत्व अवकाश मिलता था। अब कोर्ट ने साफ किया है कि गोद लेने वाली माताओं को बच्चे की उम्र चाहे जो भी हो, 12 हफ्ते का मातृत्व अवकाश मिलेगा। कोर्ट ने कहा कि गोद लेना भी परिवार बनाने का एक समान अधिकार है और गोद लिए गए बच्चों को भी उतनी ही देखभाल मिलनी चाहिए। यह फैसला महिलाओं और बच्चों के अधिकारों को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
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