
Delhi Assembly Elections 2025: दिल्ली में अगले साल फरवरी में 70 विधानसभा सीटों के लिए चुनाव होने है। इस बाद दिल्ली सरकार और कांग्रेस अलग-अलग चुनाव लड़ रही है। क्योंकि कुछ ही महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव में साथ रहे दोनों दलों कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच दरारें आ चुकी है।
AAP के साथ गठबंधन का खामियाजा
इसी बीच, बीते दिनों कांग्रेस के कोषाध्यक्ष अजय माकन ने आम आदमी पार्टी और बीजेपी के खिलाफ आरोप पत्र और श्वेत पत्र जारी किया। अजय माकन ने इस दौरान 2013 में त्रिशंकु जनादेश के बाद अरविंद केजरीवाल की अगुवाई वाली 49 दिन की गठबंधन सरकार का जिक्र करते हुए इसे कांग्रेस की बड़ी भूल बताया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने अगर उस समय केजरीवाल सरकार के गठन में सहयोग नहीं किया होता तो आज दिल्ली के नागरिकों को समस्याएं नहीं झेलनी पड़तीं।
अजय माकन ने हालिया लोकसभा चुनाव के दौरान इंडिया ब्लॉक में आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन को कांग्रेस के लिए नुकसानदेह बताया। उन्होंने कहा कि इस गठबंधन का खामियाजा पार्टी विधानसभा चुनाव में भुगत रही है। अजय माकन और दिल्ली कांग्रेस के तमाम नेता जहां 11 साल पुरानी भूल को याद कर रहे हैं। अब सवाल है कि कांग्रेस क्यों बार-बार 11 साल पुरानी भूल याद कर रही है?
कांग्रेस को याद आ रही पुरानी भूल
कांग्रेस को बार-बार अपनी 11 साल पुरानी भूल याद आ रही हैष दरअसल, इसका कारण 2008, 2013 और 2015 के नतीजों में छुपा बुआ है। बता दें, साल 2008 के दिल्ली चुनाव में कांग्रेस ने 40.3 फीसदी वोट शेयर के साथ 43 सीटें जीत सरकार बनाई थी। तो वहीं, कांग्रेस 2013 में 24.70 फीसदी वोट शेयर के साथ आठ सीटें ही जीत सकी। जिसके बाद बीजेपी 33.3 फीसदी वोट शेयर के साथ 31 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। तो वहीं, आम आदमी पार्टी ने 29.70 फीसदी वोट शेयर के साथ 28 सीटें जीती।
तब बीजेपी को सत्ता से दूर रखने के लिए कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी को समर्थन देकर अरविंद केजरीवाल की अगुवाई में सरकार बनाई थी। लेकिन यह सरकार 49 दिन ही चल सकी। जिसके बाद केजरीवाल ने पद से इस्तीफा दे दिया।
AAP की झाड़ू से साफ हुई कांग्रेस
अब साल 2015 में दिल्ली में हुए विधानसभा चुनाव की बात करें तो इस बार आम आदमी पार्टी की झाड़ू ऐसी चली कि कांग्रेस ही साफ हो गई। कांग्रेस को 9.7 फीसदी वोट मिले और पार्टी खाता खोलने में भी विफल रही। दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी को 54.5 फीसदी वोट मिले और वह 67 सीटें जीतने में सफल रही। तो वहीं, बीजेपी सिर्प तीन सीटें ही हासिल कर सकीं। लेकिन पार्टी का वोट शेयर 32.3 फीसदी रहा जो 2013 के मुकाबले महज एक फीसदी ही कम था। ऐसे नतीजों के पीछे कांग्रेस का वोट बैंक आम आदमी पार्टी के साथ शिफ्ट हो जाने को वजह माना जाता है जिसमें एक फैक्टर गठबंधन भी कहा जाता है।
कांग्रेस फिर खड़ी नहीं हो सकी
इसके बाद 2020 के दिल्ली चुनाव में कांग्रेस का वोट शेयर गिरकर 4.3 फीसदी पहुंच गया। पार्टी का खाता तब भी नहीं खुला था। इस चुनाव में आम आदमी पार्टी के वोट शेयर में .5 फीसदी की मामूली वृद्धि देखी गई। तो वहीं, बीजेपी का वोट शेयर और सीटें, दोनों बढ़ीं। बीजेपी का वोट शेयर 2015 के मुकाबले 6.4 फीसदी बढ़कर 38.7 पहुंच गया और पार्टी आठ सीटें जीतने में सफल रही थी।
वहीं, अब लोकसभा चुनावों की बात करें तो 2014 से 2024 तक, लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को ठीक-ठाक वोट जरूर मिलते रहे। लेकिन वह ऐसी स्थिति में कभी नहीं आ सकी कि सीट जीत सकें। हालिया चुनाव में आम आदमी पार्टी से गठबंधन के बावजूद दिल्ली में कांग्रेस खाली हाथ ही रह गई थी।
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