Kanji Manchhu Desai: अमेरिका के हाईवे पर बने छोटे-बड़े मोटल और होटल कारोबार में गुजराती परिवारों की मजबूत पकड़ है। खासकर पटेल समुदाय ने इस क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई है। लेकिन इस सफलता की कहानी के पीछे एक ऐसा नाम भी है, जिसे कम ही लोग जानते हैं। यह नाम है कानजी मनछू देसाई। उन्हें अमेरिका में पटेल समुदाय के होटल कारोबार की नींव रखने वाले शुरुआती लोगों में गिना जाता है।
गुजरात से अमेरिका पहुंचे कानजी
कानजी देसाई का जन्म गुजरात के सूरत जिले के डिगास गांव में एक किसान परिवार में हुआ था। परिवार पर कर्ज था और जमीन भी नहीं थी। बेहतर भविष्य की तलाश में वे अपने साथी भीखू भक्ता के साथ पहले त्रिनिदाद पहुंचे। वहां भी उन्हें मजदूरी और गरीबी का सामना करना पड़ा। इसके बाद दोनों अमेरिका पहुंच गए। कानजी कैलिफोर्निया के सैक्रामेंटो पहुंचे, जहां उन्होंने खेतों में मजदूरी की। कई साल तक तेज गर्मी में काम करने के बावजूद उनकी कमाई बहुत कम थी। उस समय उन्हें करीब 10 सेंट प्रति घंटे की मजदूरी मिलती थी। साथ ही, बिना जरूरी दस्तावेजों के रहने के कारण हमेशा प्रशासन का डर बना रहता था।
1942 में बदल गई जिंदगी
कानजी की जिंदगी में बड़ा बदलाव 1942 में आया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका में जापानी मूल के लोगों को डिटेंशन कैंप भेजा जा रहा था। इसी दौरान सैक्रामेंटो के एक 32 कमरों वाले होटल की जापानी मालकिन ने कानजी से होटल संभालने को कहा। 15 अक्टूबर 1942 को कानजी ने फोर्ड होटल की जिम्मेदारी संभाली। उन्होंने 350 डॉलर डाउन पेमेंट देकर होटल लिया और कमरों का किराया बेहद कम रखा। पहले ही महीने उन्हें करीब 100 डॉलर का मुनाफा हुआ। खेतों में मजदूरी करने वाले कानजी के लिए यह बड़ी उपलब्धि थी।
नए गुजराती युवाओं की मदद
कानजी ने अपने होटल को सिर्फ कारोबार का जरिया नहीं बनाया। वे भारत से अमेरिका आने वाले गुजराती युवाओं को रहने और काम सीखने का मौका देते थे। कई युवाओं को वे होटल का काम सिखाते और पैसे बचाने की सलाह देते। जरूरत पड़ने पर बिना किसी लिखित समझौते के भरोसे पर कर्ज भी देते थे। 1947 में उन्होंने सैन फ्रांसिस्को में गोल्डफील्ड होटल लीज पर लिया। इसके बाद कई गुजराती परिवारों ने होटल और मोटल कारोबार में कदम रखा। एक व्यक्ति के स्थापित होने के बाद वह अपने रिश्तेदारों को अमेरिका बुलाता और उन्हें भी इसी कारोबार में आगे बढ़ने में मदद करता।
नस्लभेद के बावजूद नहीं मानी हार
भारतीय होटल मालिकों को बाद के वर्षों में नस्लभेद और आर्थिक मुश्किलों का सामना करना पड़ा। कई बैंकों से उन्हें लोन नहीं मिलता था और इंश्योरेंस कंपनियों पर भी भेदभाव के आरोप लगे। ऐसे समय में पटेल परिवारों ने एक-दूसरे की आर्थिक मदद की और परिवार के सदस्य मिलकर होटल चलाते रहे।
गुमनामी में हुआ निधन
कानजी देसाई की निजी जिंदगी बेहद मुश्किल रही। उनकी पत्नी की मौत भारत में हुई, लेकिन दस्तावेजों की समस्या के कारण वह अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो सके। उनके बच्चे भी भारत में ही रहे। बाद में उन्हें अमेरिका से डिपोर्ट कर दिया गया। वह लंदन चले गए और 1965 में वहीं उनका निधन हो गया। कानजी देसाई भले ही बड़ी दौलत छोड़कर नहीं गए, लेकिन होटल कारोबार का जो रास्ता उन्होंने दिखाया, उस पर आगे चलकर हजारों गुजराती परिवार चले। आज अमेरिका के होटल और मोटल उद्योग में पटेल समुदाय की मजबूत मौजूदगी इसी लंबी मेहनत और सामुदायिक सहयोग की कहानी को दर्शाती है।
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