
American Lawyer Challenges Trump: अमेरिका में जन्म-संवत नागरिकता पर बहस तेज हो गई है और इसी बीच भारतीय-अमेरिकी वकील स्मिता घोष इस विषय पर कानूनी लड़ाई की एक प्रमुख आवाज बनकर सामने आई हैं। वे डोनाल्ड ट्रंप के उस कार्यकारी आदेश के खिलाफ मुकदमे में शामिल हैं, जिसमें जन्म-संवत नागरिकता को सीमित करने की कोशिश की गई थी।
स्मिता ने क्यों दी ट्रंप को चुनौती
स्मिता घोष ने यह आदेश चुनौती दी है क्योंकि उनका कहना है कि यह अमेरिकी संविधान के 14वें संशोधन (14th Amendment) की लंबे समय से मान्यता प्राप्त सुरक्षा को कमजोर करता है। 14वें संशोधन के तहत, जो व्यक्ति अमेरिका में पैदा होता है, वह स्वतः अमेरिकी नागरिक माना जाता है। घोष का मामला इस लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि यह अमेरिका में नागरिकता की परिभाषा को नए तरीके से देखने का मार्ग तैयार कर सकता है और इसे अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने भी गंभीरता से देखा है।
क्या है स्मिता की पहचान?
स्मिता घोष केवल कोर्टरूम में ही सक्रिय नहीं हैं, बल्कि एक विद्वान वकील के रूप में भी उन्हें पहचान मिली है। सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट के अनुसार, वे अपीलीय वकील हैं और उन्होंने नागरिकता के इतिहास पर व्यापक लेख लिखे हैं। हाल ही में उन्होंने जन्म-संवत नागरिकता के इतिहास और 14वें संशोधन से पहले के कानूनों, जैसे 1844 में न्यूयॉर्क का एक केस, का विश्लेषण किया। उनका तर्क है कि 14वें संशोधन का उद्देश्य मौजूदा कानूनी सिद्धांतों की पुष्टि करना था, उन्हें सीमित करना नहीं, जो ट्रंप के आदेश की व्याख्या के बिल्कुल विपरीत है।
संविधान पर उठ रहे सवाल
स्मिता घोष उन नागरिक अधिकार एक्टिविस्ट्स के समूह का हिस्सा हैं जो इस आदेश को प्रवासी समुदायों के खिलाफ हमला मानते हैं। वे उन भारतीय-अमेरिकी वकीलों में शामिल हैं, जो यह लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक ले जा रहे हैं और इस तरह अमेरिकी इमिग्रेशन कानून पर प्रवासी समुदायों की भूमिका को भी उजागर कर रहे हैं। इस केस का मतलब केवल एक आदेश नहीं है, बल्कि संविधान की मूल भावना पर सवाल है: “अमेरिका में पैदा होने वाला हर व्यक्ति नागरिक है।” कानूनी विशेषज्ञ मानते हैं कि इस व्याख्या में बदलाव से इमिग्रेशन पॉलिसी, पहचान और नागरिक अधिकारों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकते हैं। हालांकि स्मिता घोष अभी अमेरिका में ज्यादा प्रसिद्ध नाम नहीं हैं, लेकिन उनके शामिल होने से यह स्पष्ट होता है कि नागरिकता और इमिग्रेशन कानून की बहस केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं बल्कि संविधान की व्याख्या का भी मामला है।
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