Supreme Court Statement: सुप्रीम कोर्ट ने आज एक ऐतिहासिक फैसले में परिवार की औरतों के योगदान को अहम माना है। कोर्ट ने कथित तौर पर उन्हें होममेकर्स की बजाय नेशन बिल्डर का दर्जा दिया है। कोर्ट का कहना है कि एक गृहिणी हर महीने कम से कम 30,000 रुपये के बराबर का घरेलू कार्य करती है। इसलिए कोर्ट ने घरेलू इनकम के नुकसान के लिए अहम निर्देश जारी किए हैं। चलिए जानते है, कोर्ट ने किस मामले में यह फैसला सुनाया है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सड़क हादसे में महिला की मौत मामले में कोर्ट ने कहा कि महिला की मौत या अक्षमता के कारण परिवार को होने वाले 'घरेलू देखभाल की हानि' को मुआवजे का एक अलग और स्वतंत्र आधार माना जाएगा। जस्टिस करोल ने फैसला सुनाते हुए कहा कि एक गृहिणी मानव विकास और राष्ट्र के विकास में योगदान देती है। ऐसे में हम कैसे गृहिणी की आय को दिहाड़ी मजदूर से कम आंक सकते है।
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कोर्ट का मानना है कि एक आदमी के बाहर जितना काम करता है, उतना ही या उससे ज्यादा काम घर की महिलाएं करती हैं। कोर्ट ने कहा 'अब अतिरिक्त मुआवजे के रूप में घरेलू देखभाल की हानि को शामिल करते हुए कोर्ट ने नए सिद्धांत तय किए। एक नेशन बिल्डर के रूप में गृहिणी के लिए घरेलू देखभाल की हानि पर न्यूनतम 30,000 रुपये प्रति माह की राशि सुनिश्चित की गई है।' वहीं, महिला की मौत मामले में मुआवजे की राशि बढ़ाकर 6 लाख रुपये कर दी गई है।
क्या है पूरा मामला?
बता दें, सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने साल 2006 में उत्तराखंड में एक सड़क हादसे में हुई महिला की मौत मामले की सुनवाई के दौरान यह फैसला सुनाया है। दरअसल, इस मामले में जिस गाड़ी से एक्सीडेंट हुआ, लेकिन उसका बीमा नहीं था। ऐसे में गाड़ी के मालिक ने मृतकों के परिजनों को 2.50 लाख रुपये का मुआवजा दिया। इसके बाद परिवार ने ज्यादा मुआवजे की मांग करते हुए हाईकोर्ट में एक अपील दायर की, जिसे साल 2017 में खारिज कर दिया गया। जिसके बाद परिवार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।