Success Story: कहते हैं कि जब किसी इंसान के मन में कुछ कर गुजरने का जज्बा और मंजिल पाने का जुनून हो, तो गरीबी, कठिनाइयां और हालात उसके रास्ते की दीवार नहीं बन पाते। पानीपत के एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाले अमित टूर्ण ने इस कहावत को सच साबित कर दिखाया है। आर्थिक तंगी, संघर्ष, असफलताओं और छह साल लंबी कानूनी लड़ाई के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और आखिरकार संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के संशोधित परिणाम में ऑल इंडिया 272वीं रैंक हासिल कर अपने सपनों को नई उड़ान दी। उनकी सफलता से जहां पूरा परिवार खुशी से झूम उठा, वहीं मां की आंखों से वर्षों के संघर्ष के आंसू खुशी बनकर छलक पड़े।
पानीपत के रहने वाले अमित टूर्ण का सपना बचपन से ही UPSC परीक्षा पास कर देश सेवा करने का था। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार से आने वाले अमित के लिए यह सफर आसान नहीं था। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई पूरी की और वर्ष 2017 से UPSC की तैयारी शुरू कर दी। अमित ने बताया कि आर्थिक परेशानियां हमेशा उनके सामने चुनौती बनकर खड़ी रहीं। वर्ष 2019 में उन्होंने पहली बार UPSC परीक्षा दी और पहले ही प्रयास में इंटरव्यू तक पहुंच गए। लेकिन अंतिम चरण में उनके आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग प्रमाण पत्र को लेकर तकनीकी विवाद खड़ा हो गया।
दरअसल, हरियाणा में EWS प्रमाण पत्र सामान्यत नायब तहसीलदार द्वारा जारी किए जाते हैं, जबकि UPSC केवल तहसीलदार स्तर के हस्ताक्षर वाले प्रमाण पत्र को मान्य मान रहा था। इसी कारण अमित समेत कई योग्य उम्मीदवारों की उम्मीदवारी रद्द कर दी गई। अमित ने हार मानने के बजाय कानूनी लड़ाई लड़ने का फैसला किया। करीब छह वर्षों तक अदालत में संघर्ष करने के बाद उन्हें न्याय मिला और UPSC के संशोधित परिणाम में उनकी 272वीं रैंक घोषित हुई।
Also read: हरियाणा की बड़ी डिजिटल क्रांति, WhatsApp चैटबॉट और AI से उपभोक्ताओं को मिलेगा तुरंत समाधान
इस दौरान अमित ने हरियाणा सरकार में विभिन्न पदों पर नौकरी भी की। उन्होंने हरियाणा भवन और पंचकूला में सरकारी सेवाएं दीं, लेकिन UPSC की तैयारी जारी रखी। कभी प्रारंभिक परीक्षा निकली तो कभी मुख्य परीक्षा, कभी इंटरव्यू तक पहुंचे, लेकिन अंतिम सफलता का इंतजार बना रहा।
अमित बताते हैं कि तैयारी के दौरान आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि कई बार खाने के लिए भी पैसे नहीं होते थे। दिल्ली में पढ़ाई के दौरान उनका बड़ा भाई विकास अपनी निजी नौकरी की कमाई का बड़ा हिस्सा उन्हें भेजता था। कई बार दोनों भाइयों ने बेहद कठिन परिस्थितियों में दिन गुजारे।
अमित याद करते हुए बताते हैं कि एक समय ऐसा भी आया जब उनके पास केवल 400 रुपये बचे थे और भाई उनके कमरे पर आ गया था। दोनों ने कई दिनों तक एक ही सब्जी में पानी मिलाकर गुजारा किया। ऐसे हालातों में भी परिवार ने उनका हौसला टूटने नहीं दिया।
मां का विश्वास बना सबसे बड़ी ताकत
अमित की मां बबली देवी ने बताया कि उनका बेटा अक्सर निराश होकर रोता था और कहता था कि उसका चयन नहीं हो रहा। लेकिन उन्होंने हमेशा उसे एक ही बात कही—"उगते सूरज को सब सलाम करते हैं, एक दिन तेरा भी समय आएगा।"
बबली देवी कहती हैं कि उन्होंने कभी बेटे का हौसला टूटने नहीं दिया। कठिन समय में भी उसे भरोसा दिलाया कि मेहनत कभी बेकार नहीं जाती। आज जब अमित की सफलता की खबर पूरे देश में पहुंची है तो उन्हें लगता है कि भगवान ने उनके सपनों को हकीकत में बदल दिया।
उन्होंने अन्य अभिभावकों से भी अपील की कि वे अपने बच्चों का हर परिस्थिति में साथ दें, क्योंकि परिवार का सहयोग ही युवाओं को बड़ी सफलता तक पहुंचाने का सबसे मजबूत आधार बनता है।
मेहनत अमित की, हमने सिर्फ साथ दिया- अमित का भाई
अमित के बड़े भाई विकास ने कहा कि परिवार ने केवल आर्थिक और मानसिक सहयोग दिया है, जबकि असली मेहनत अमित ने की है। उन्होंने कहा कि दिल्ली में बैठकर वर्षों तक लगातार पढ़ाई करना और संघर्ष करना आसान नहीं था। आज जो सफलता मिली है, वह अमित की लगन, मेहनत और धैर्य का परिणाम है।