" मुस्लिम पुरुष को पत्नी की बात माननी...", हाईकोर्ट ने शरीयत काउंसील को लगाई लताड़

Madras High Court Order On Divorce:मुस्लिमों में तलाक को लेकर सोमवार यानी 28अक्टूबर को मद्रास हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला दिया है। हाई कोर्ट ने कहा कि अगर पति की तरफ से तलाक दिए जाने को पत्नी झुठला रही है, तो अदालत के जरिए ही तलाक हो सकता है। इस टिप्पणी के साथ हाई कोर्ट ने तमिलनाडु की शरीयत काउंसिल की तरफ से जारी तलाक सर्टिफिकेट को अवैध बताया है। कोर्ट ने दूसरी शादी कर चुके पति को यह आदेश भी दिया है कि "वह पहली पत्नी को मुआवजा और गुजारा भत्ता दे।

जस्टिस जी आर स्वामीनाथन ने अपने फैसले में यह भी कहा कि पति अगर दूसरी शादी कर ले, तो पहली पत्नी को उसके साथ रहने के लिए नहीं रोका जा सकता है।  बता दें कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार, पुरुष को एक से अधिक शादी करने की इजाजत है। जिसके कारण पहली पत्नी को मानसिक पीड़ा होती है। ऐसे में 'घरेलू हिंसा कानून' की धारा 3के तहत इसे क्रूरता माना जाता है। अगर पहली पत्नी पति के दूसरे विवाह से राजी नहीं है, तो धारा 12के तहत अपने पति से अलग रह सकती हैं। तथा पति से गुजारा भत्ता की मांग कर सकती है।

क्या है पूरा मामला?

बता दें कि जिस मामले में हाई कोर्ट ने यह निर्णय सुनाया है। उसमें महिला और पुरुष की शादी 2010में हुई थी। साल 2018में पत्नी ने पति पर घरेलू हिंसा की धाराओं में केस दर्ज करवाया था। जवाब में महिला के पति ने कहा कि "वह महिला को तलाक दे चुका है। वहीं, मुस्लिम पर्सनल लॉ में तलाक के तीन नोटिस जारी करने होते हैं लेकिन, कोर्ट के सामने सिर्फ पहला और दूसरा नोटिस ही पेश किया गया। जिसके बाद कोर्ट ने यह फैसला सुनाया है।

"शरीयत काउंसिल नहीं कर सकता फैसलाः कोर्ट           

तीसरा नोटिस कोर्ट में नहीं पेश करने के बदले महिला के पति ने एक सर्टिफिकेट पेश किया। जे सर्टिफिकेट शरीयत काउंसिल के चीफ काज़ी की तरफ से दिया गया था। 29नवंबर 2017की तारीख को जारी किए गए सर्टिफिकेट में काजी ने तलाक को वैध बताया था। तलाक को वैध बताने के लिए इस बात को आधार बनाया गया था कि पति के पिता ने तलाक हो जाने की पुष्टि की है। इसपर हाई कोर्ट ने कहा कि तीसरे नोटिस की जगह पिता की गवाही के आधार पर तलाक को मान्यता नहीं मिल सकती।    

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