Indian Monsoon: भारत में मानसून सिर्फ बारिश का मौसम नहीं है, बल्कि करोड़ों लोगों की जिंदगी और देश की अर्थव्यवस्था की सबसे अहम आधार प्रणाली है। इसके बावजूद यह आज भी पूरी तरह समझा नहीं जा सका है। वैज्ञानिक यह तो जानते हैं कि मानसून हर साल आएगा, लेकिन यह कब, कहां और कितनी बारिश करेगा, इसका सटीक अनुमान लगाना अभी भी चुनौती बना हुआ है। पिछले कुछ वर्षों में मानसून का व्यवहार और भी अनिश्चित हो गया है। कभी कुछ इलाकों में भारी बारिश और बाढ़ आ जाती है, तो कहीं लंबे समय तक सूखा पड़ जाता है। इस बदलाव का सबसे ज्यादा असर खेती, पानी की व्यवस्था और आम लोगों के जीवन पर पड़ रहा है।
बढ़ रही हैं एक साथ कई आपदाएं
उत्तराखंड सरकार ने 2022 में एक सख्त आदेश जारी किया था, जिसके तहत पूरे मानसून सीजन में अधिकारियों की छुट्टियां रद्द कर दी गई थीं। यह दिखाता है कि अब मानसून को आपदा प्रबंधन से जोड़कर देखा जा रहा है। भूस्खलन, बादल फटना और अचानक बाढ़ जैसी घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। भारत में मुख्य रूप से दो प्रकार के मानसून होते हैं। सबसे महत्वपूर्ण दक्षिण-पश्चिम मानसून है, जो जून में केरल से शुरू होकर पूरे देश में फैलता है और लगभग 70 प्रतिशत बारिश लाता है। दूसरा पूर्वोत्तर मानसून है, जो अक्टूबर के आसपास तमिलनाडु और दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में बारिश करता है।
इन क्षेत्रों से शुरू होता है मानसून
मानसून बनने की प्रक्रिया बहुत जटिल है। गर्मियों में जमीन तेजी से गर्म होती है, जबकि समुद्र धीरे-धीरे गर्म होता है। इसी अंतर के कारण समुद्र से नम हवाएं भारत की ओर चलती हैं। ये हवाएं बादलों में बदलकर बारिश करती हैं। इस प्रक्रिया में अरब सागर, बंगाल की खाड़ी और तिब्बत का पठार महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
कई वैश्विक कारक करते हैं प्रभावित
इसके अलावा कई वैश्विक कारक भी मानसून को प्रभावित करते हैं, जैसे अल-नीनो, ला-नीना, इंडियन ओशन डाइपोल और मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन। ये सभी सिस्टम बारिश की मात्रा और समय को बदल सकते हैं। पहाड़ी क्षेत्र जैसे हिमालय और पश्चिमी घाट भी मानसून की दिशा और ताकत को प्रभावित करते हैं। मानसून का इतिहास भी बहुत पुराना है। वैज्ञानिक मानते हैं कि यह प्रक्रिया लगभग 8 करोड़ साल पहले शुरू हुई थी और आज इसका आधुनिक रूप करीब 2 करोड़ साल पहले बना। प्राचीन काल में नाविक और व्यापारी भी मानसूनी हवाओं का उपयोग यात्रा और व्यापार के लिए करते थे।
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