
AMU Minority Status Case: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) के अल्पसंख्यक दर्जे को लेकर अहम फैसला सुनाया। कोर्ट ने 4-3के बहुमत से यह निर्णय लिया कि AMUका अल्पसंख्यक दर्जा बरकरार रहेगा। इस फैसले से लंबे समय से चल रहा कानूनी विवाद खत्म होने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है।
तीन जजों ने दी अलग राय
सुप्रीम कोर्ट की सात सदस्यीय संविधान पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। मुख्य न्यायाधीश (CJI) डीवाई चंद्रचूड़ और चार अन्य जजों ने इस फैसले को एकमत से समर्थन दिया। वहीं, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने इस फैसले पर असहमत होकर डिसेंट नोट दिया। CJI ने इस फैसले के दौरान स्पष्ट किया कि AMUको अल्पसंख्यक संस्थान के रूप में मान्यता देने के लिए यह जरूरी है कि विश्वविद्यालय का धर्मनिरपेक्ष और शैक्षिक चरित्र बरकरार रहे।
CJIका कार्यकाल समाप्त
इस महत्वपूर्ण फैसले के दिन सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख न्यायधीश डीवाई चंद्रचूड़ का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। 10नवंबर को वह सेवानिवृत्त हो रहे हैं। उनके नेतृत्व में लिया गया यह अहम निर्णय उनके कार्यकाल को ऐतिहासिक बना गया है।
AMUका इतिहास और विवाद
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना 1875में सर सैयद अहमद खान ने की थी, जिसका उद्देश्य मुसलमानों के शैक्षिक उत्थान के लिए एक केंद्र स्थापित करना था। 1920में इसे विश्वविद्यालय का दर्जा मिला।
AMUको अल्पसंख्यक दर्जा देने का मुद्दा लंबे समय से कानूनी विवाद का कारण रहा है। 1967 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे केंद्रीय विश्वविद्यालय मानते हुए इसे अल्पसंख्यक संस्थान नहीं माना था। 1981 में AMUको अल्पसंख्यक दर्जा देने के लिए संशोधन किया गया, लेकिन 2005 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इसे असंवैधानिक करार दिया। इसके बाद, 2006 में केंद्र सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने मामले को सात जजों की बेंच को सौंप दिया। अब 2024 में इस पर अंतिम फैसला सुनाया गया।
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