क्या सरकार जनकल्याण के लिए आपकी निजी संपत्ति ले सकती है? सुप्रीम कोर्ट ने दिया जवाब

क्या सरकार जनकल्याण के लिए आपकी निजी संपत्ति ले सकती है? सुप्रीम कोर्ट ने दिया जवाब

SC DecisionOn Private Property: क्या किसी की निजी संपत्ति को जनकल्याण के नाम पर लिया जा सकता है? इस पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (5नवंबर) को एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया। कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को पलटते हुए यूपी मदरसा एक्ट के संदर्भ में अपनी पिछली राय को बदलते हुए नए दिशा-निर्देश जारी किए। सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि हर निजी संपत्ति को सामुदायिक संपत्ति नहीं कहा जा सकता, और इसका उपयोग केवल सार्वजनिक हित में किया जा सकता है, बशर्ते कि इसकी उचित समीक्षा की जाए।

निजी संपत्ति और सामुदायिक संसाधन का अंतर

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि केवल कुछ विशेष संसाधनों को ही सरकार सामुदायिक संसाधन के रूप में मान सकती है, जिन्हें सार्वजनिक उपयोग के लिए लिया जा सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि सार्वजनिक हित में संपत्ति का अधिग्रहण तभी किया जा सकता है, जब उसकी पूरी तरह से समीक्षा की जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि इसका उपयोग जनहित में हो।

जस्टिस अय्यर के फैसले को किया खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस कृष्ण अय्यर के 1970के दशक के फैसले को खारिज कर दिया था, जिसमें कहा गया था कि राज्य हर निजी संपत्ति को अधिग्रहित कर सकता है। कोर्ट ने इसे अस्वीकार करते हुए कहा कि यह विचार समाजवादी अर्थव्यवस्था के दौर से आया था। अब, 1990के दशक से भारत ने बाजार उन्मुख अर्थव्यवस्था की ओर कदम बढ़ाए हैं, और यह समय की आवश्यकता बन गई है कि सरकार को नई आर्थिक नीतियों के अनुरूप कानून बनाने का अधिकार मिले।

भारत की बदलती अर्थव्यवस्था और सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था किसी एक विशेष मॉडल पर आधारित नहीं है। इसका उद्देश्य विकासशील देश के रूप में उभरते हुए आर्थिक और सामाजिक बदलावों का सामना करना है। पिछले 30वर्षों में भारत ने गतिशील नीतियों को अपनाया है, जिसके परिणामस्वरूप भारत अब दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बन चुका है। कोर्ट ने यह भी कहा कि निजी संपत्ति के अधिकारों की रक्षा करते हुए इसका उपयोग सार्वजनिक हित में किया जा सकता है, बशर्ते इसे न्यायिक रूप से उचित ठहराया जाए।

संविधान पीठ का ऐतिहासिक फैसला

यह फैसला सुप्रीम कोर्ट की 9जजों की संविधान पीठ ने सुनाया। पीठ में मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ के साथ जस्टिस ऋषिकेश रॉय, जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, जस्टिस सुधांशु धूलिया, जस्टिस जे.बी. पारदीवाला, जस्टिस मनोज मिश्रा, जस्टिस राजेश बिंदल, जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह शामिल थे। इस फैसले ने निजी संपत्ति के अधिकारों को बनाए रखते हुए सार्वजनिक हित के लिए उनके उचित उपयोग का मार्गदर्शन किया है।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से यह साफ हो गया है कि सार्वजनिक हित के लिए निजी संपत्ति का अधिग्रहण तभी किया जा सकता है, जब इसके उचित और कानूनी आधार को स्पष्ट किया जाए। इस फैसले ने भारतीय न्यायपालिका में संपत्ति अधिकारों के महत्व को और भी मजबूती से स्थापित किया है।

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