Khabar Fast, Bikanerwala Success Story : जो कभी मेहनत करना नहीं छोड़ते है वो एक न एक दिन जरूर कामयाब होते है आ हम आपके लिए ऐसे शख्स की कहानी लेकर आए है जिन्होंने अपने ब्रांड से देश ही नहीं विदेशों में भी पहचान बनाई है। शुरुआत में काकाजी बाल्टी में रसगुल्ले भरकर और कागज की पुड़िया में बीकानेरी भुजिया और नमकीन बांधकर बेचते थे। दिन भर में करीब पांच रुपये की कमाई होती थी। जिसमें वह बहुत खुश हो जाते थे।
लगता है जैसे कल की ही बात हो... जब मैं पांच-छह साल पहले देश-विदेश में मशहूर 'बीकानेरवाला' ब्रांड के संस्थापक लाला केदारनाथ अग्रवाल उर्फ काकाजी (86) से उनके करोल बाग वाले घर पर मिला था। मुझे भूख नहीं थी फिर भी 'अतिथि देवो भव:' को साकार करते हुए खुद काकाजी ने मुझे एक-एक बाइट तोड़कर खाना खिलाया था। डाइनिंग टेबल पर ही उनसे बाल्टी में पांच रुपये के रसगुल्ले बेचने से लेकर 'बीकानेरवाला' के 2500 करोड़ रुपये से अधिक के सफर के बारे में बातचीत हुई थी। Bikanerwala Success Story
सरल स्वभाव
अब जबकि सोमवार को काकाजी का शरीर पूरा होने के बाद वह हमारे बीच नहीं हैं, तब उनकी एक-एक बात ऐसे याद आ रही है जैसे यह कल की ही बात हो। इतनी बड़ी शख्सियत होने के बावजूद वह बेहद सरल और मृदुल स्वभाव के थे। डाइनिंग टेबल पर खाने के साथ-साथ काकाजी से हलके-फुलके अंदाज में हुई बातचीत में उन्होंने बीकानेरवाला के पूरे सफर के बारे में बताया था।
बीकानेर से सफर शुरू
बतौर काकाजी 1955 में वह राजस्थान के बीकानेर से अपने बड़े भाई सत्यनारायण अग्रवाल के साथ कोलकाता और मुंबई से होते हुए दिल्ली आए थे। यहां उनका कोई ठौर-ठिकाना नहीं था। किसी जानकार के माध्यम से पुरानी दिल्ली में संतलाल खेमका धर्मशाला में दोनों भाई ठहरे थे। शुरू में परांठे वाली गली में फिर 1956 में नई सड़क पर एक अलमारी किराए पर मिली। दिल्ली में सबसे पहली दुकान 1962 में मोती बाजार में हुई। इसके बाद 1972 में करोल बाग में दुकान खरीदी जो अभी तक चल रही है। आज 'बीकानेरवाला' और 'बीकानो' के देश-विदेश में 200 से अधिक आउटलेट हैं। Bikanerwala Success Story
बेचते थे रसगुल्ले
काकाजी ने बताया था कि शुरुआत में वह बाल्टी में रसगुल्ले भरकर और कागज की पुड़िया में बीकानेरी भुजिया और नमकीन बांधकर बेचते थे। दिन भर में करीब पांच रुपये की कमाई होती थी। जिसमें वह बहुत खुश हो जाते थे। पांच रुपये की यह कमाई आज 2500 करोड़ रुपये से भी अधिक की टर्नओवर के रूप में पहुंच गई है।
उनके इतनी जल्दी हिट होने के पीछे का भी एक बड़ा कारण दिवाली रही। 1955 में जब दोनों भाई दिल्ली आए थे, तब कुछ दिन बाद ही दिवाली थी। पुरानी दिल्ली में उनके रसगुल्ले पहले से ही पसंद किए जाने लगे थे, लेकिन दिवाली की बिक्री ने उन्हें सुपरहिट कर दिया। Bikanerwala Success Story
रसगुल्लों की बिक्री
हाल यह हो गया कि रसगुल्लों की बिक्री पर राशनिंग करनी पड़ी। एक ग्राहक को एक बार में 10 से अधिक रसगुल्ले नहीं बेचते थे, नहीं तो और ग्राहकों को रसगुल्ले नहीं मिल पा रहे थे। यह भी बता दें कि आज के बीकानेरवाला ब्रांड का नाम 1955 में BBB रखा गया था। जिसे अगले साल ही बड़े भाई और स्थानीय लोगों की सलाह पर बदलकर बीकानेरवाला कर दिया गया। फिर तब से आज तक यही ब्रांड चल रहा है।
बड़ा है परिवार
परिवार में तीन बेटे और तीन बेटियां हैं। सभी शादीशुदा हैं। बेटों में सबसे बड़े राधे मोहन अग्रवाल (63), नवरत्न अग्रवाल (59) और सबसे छोटे रमेश अग्रवाल (56) हैं। नवरत्न अग्रवाल और काकाजी के पोते रोहित अग्रवाल बताते हैं कि कोरोना काल में भी काकाजी एकदम स्वस्थ रहे थे। उनका ऑक्सीजन लेवल हम सबसे अच्छा रहता था। वह कभी भी तनाव में नहीं रहते थे। Bikanerwala Success Story
यही नहीं जब वह करीब 65 साल के थे तब वह लोग दुबई, सिंगापुर और थाइलैंड टूर पर गए थे। जहां उन्होंने पैराग्लाइडिंग के लिए भी कहा था। वह पूरे परिवार को एक ही धागे में बांधने वाले जादूगर थे। उनके जाने से हमारे लिए तो एक युग का अंत हो गया। पूरा परिवार पिता काकाजी और मां नौरती देवी के संस्कारों पर ही चलता है।