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8 महीने की जंग के बाद जीता जिंदगी का मुकाबला, सरकारी अस्पताल में GBS से पीड़ित बच्चे को मिली नई जिंदगी

8 महीने की जंग के बाद जीता जिंदगी का मुकाबला, सरकारी अस्पताल में GBS से पीड़ित बच्चे को मिली नई जिंदगी

Delhi News: दिल्ली के स्वामी दयानंद अस्पताल के डॉक्टरों ने एक गंभीर बीमारी से परेशान बच्चे को नई जिंदगी मिली। लक्षित नाम का बच्चा गिलियन-बैरे सिंड्रोम (GBS) नाम की बीमारी से पीड़ित था। इस बीमारी में शरीर की इम्यून सिस्टम गलती से नसों पर हमला कर देती है। इससे शरीर की मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं और मरीज को लकवा तक मार सकता है।

लंबे समय से वेंटिलेटर पर था लक्षित

लक्षित की हालत तेजी से बिगड़ गई थी। वह अपने दम पर सांस भी नहीं ले पा रहा था, इसलिए उसे लंबे समय तक वेंटिलेटर पर रखना पड़ा। शुरुआत में उसे गुरु तेग बहादुर (GTB) अस्पताल में भर्ती कराया गया था। बाद में बेहतर इलाज के लिए उसे स्वामी दयानंद अस्पताल भेजा गया। अस्पताल के बाल रोग विभाग के प्रमुख डॉ. सुरेंद्र सिंह बिष्ट ने बताया कि डॉक्टरों ने समय रहते बीमारी के लक्षण पहचान लिए। जांच के लिए खून की जांच और आईएचबीएएस (IHBAS) की मदद से नर्व कंडक्शन वेलोसिटी (NCV) टेस्ट कराया गया, जिससे GBS की पुष्टि हुई।

चार महीने बाद खाना खाने लगा

बीमारी बढ़ने पर बच्चे को सांस लेने में दिक्कत होने लगी। उसे वेंटिलेटर पर रखा गया और लंबे समय तक सांस दिलाने के लिए ट्रेकियोस्टॉमी करनी पड़ी। इस दौरान उसकी मांसपेशियां बहुत कमजोर हो गई थीं। डॉक्टरों ने उसे इंट्रावेनस इम्यूनोग्लोबुलिन (IVIG) थेरेपी की 10 खुराक दी। एक इंजेक्शन की कीमत करीब 15 हजार रुपये है। इलाज के दौरान उसे फीडिंग ट्यूब के जरिए पोषण दिया गया और लगातार फिजियोथेरेपी कराई गई। करीब चार महीने बाद वह सामान्य तरीके से खाना खाने लगा।

तीन बार आया कार्डियक अरेस्ट

अस्पताल के उप चिकित्सा अधीक्षक डॉ. प्रशांत जैन ने बताया कि इलाज के दौरान बच्चा लगभग तीन महीने तक वेंटिलेटर पर रहा और उसे तीन बार कार्डियक अरेस्ट भी आया। करीब आठ महीने बाद डॉक्टर उसकी ट्रेकियोस्टॉमी ट्यूब हटाने में सफल हुए। अब वह फिर से अपने पैरों पर चलने लगा है। डॉक्टरों का कहना है कि यह सफलता समय पर सही इलाज, गहन देखभाल और लंबे पुनर्वास का परिणाम है। उन्होंने बताया कि यदि यह इलाज किसी निजी अस्पताल में होता तो परिवार को लाखों रुपये खर्च करने पड़ते। अस्पताल के डॉक्टरों ने कहा कि यह मामला साबित करता है कि सरकारी अस्पतालों में भी गंभीर से गंभीर बीमारियों का उच्च स्तर का इलाज संभव है। समर्पित डॉक्टरों, नर्सों और स्वास्थ्य कर्मियों की टीम ने मिलकर एक बच्चे की जिंदगी बचाई, जो सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।

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