Char Dham Yatra: उत्तराखंड में चारधाम यात्रा, हेमकुंड साहिब और फूलों की घाटी में इस समय बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक पहुंच रहे हैं। इससे स्थानीय कारोबार को फायदा हो रहा है, लेकिन बढ़ती भीड़ के साथ पहाड़ों पर कूड़े की समस्या भी गंभीर होती जा रही है। खासकर प्लास्टिक की बोतलें, रैपर और दूसरे प्लास्टिक कचरे से हिमालयी पर्यावरण पर खतरा बढ़ रहा है। चारधाम यात्रा मार्ग पर अब तक करीब 792 टन कूड़ा-कचरा जमा किया जा चुका है। इस साल चारधाम यात्रा 19 अप्रैल से शुरू हुई थी। यानी करीब 150 दिनों में रोजाना औसतन लगभग 5 टन कचरा जमा हुआ। यात्रा के शुरुआती दिनों में श्रद्धालुओं की संख्या ज्यादा होने के कारण कचरा भी ज्यादा जमा हुआ था। बाद में मौसम खराब होने और यात्रियों की संख्या कम होने से कचरा जमा होने की रफ्तार कम हुई।
इन जगहों पर जमा हुआ कूड़े का पहाड़
केदारनाथ धाम से अब तक करीब 283 टन कूड़ा इकट्ठा किया गया है। इसमें से 5.5 टन कॉम्पैक्ट प्लास्टिक वेस्ट को रिसाइक्लिंग के लिए भेजा जा चुका है। केदारनाथ से गौरीकुंड तक सफाई के लिए 412 पर्यावरण मित्र और 30 सुपरवाइजर तैनात हैं। बदरीनाथ धाम में अब तक करीब 363.3 टन कूड़ा जमा हुआ है। वहीं गंगोत्री में करीब 98 टन और यमुनोत्री में करीब 48.2 क्विंटल कचरा इकट्ठा किया गया है।
पहाड़ी इलाकों कि बढ़ी चिंता
हेमकुंड साहिब और फूलों की घाटी के रास्ते पर भी प्लास्टिक कचरे की बड़ी मात्रा सामने आई है। पर्यावरण विकास समिति भ्यूंडर के मुताबिक, 10 सितंबर तक यात्रा मार्ग और आसपास के इलाकों से 26,300 बैग प्लास्टिक सामग्री इकट्ठा की गई। इसमें 22,300 बैग प्लास्टिक की बोतल और दूसरी प्लास्टिक सामग्री के थे, जबकि 4,000 बैग में प्लास्टिक रैपर, रेनकोट और अन्य कचरा था। पर्यावरण विशेषज्ञों के मुताबिक प्लास्टिक का कचरा लंबे समय तक नष्ट नहीं होता। इसके छोटे कण पानी और मिट्टी को प्रभावित कर सकते हैं। इससे पहाड़ी इलाकों के प्राकृतिक संतुलन पर भी असर पड़ने की चिंता है।
बढ़ सकती है कई तरह की समस्या
पर्यावरणविद् और प्रोफेसर एसपी सती ने जानकारी देते हुए बताया कि में प्लास्टिक कचरे को गंभीर चिंता का विषय बताया। उनके मुताबिक, इससे पानी के प्रदूषण और मिट्टी के कटाव जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। फूलों की घाटी जैसे संवेदनशील इलाकों में प्लास्टिक प्रदूषण से स्थानीय वनस्पतियों पर भी असर पड़ने की आशंका है। उत्तराखंड में हर साल श्रद्धालुओं और पर्यटकों से कूड़ा न फैलाने की अपील की जाती है। इसके बावजूद ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्रों में कचरे का बढ़ना पर्यावरण संरक्षण के सामने बड़ी चुनौती बना हुआ है।
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