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दादा की जमीन पर पोते का हक नहीं! राजस्थान हाईकोर्ट का अहम फैसला, जानें अदालत ने क्या कहा

दादा की जमीन पर पोते का हक नहीं! राजस्थान हाईकोर्ट का अहम फैसला, जानें अदालत ने क्या कहा

Rajasthan News: राजस्थान हाईकोर्ट ने दादा की जमीन पर पोते के अधिकार को लेकर अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल इसलिए कि कोई जमीन दादा के नाम थी, पोता उस पर अपना जन्मसिद्ध या पैतृक अधिकार नहीं जता सकता। अगर दादा की मौत बिना वसीयत के होती है और संपत्ति हिंदू उत्तराधिकार कानून के तहत उनके बेटों को मिलती है, तो बेटे के हिस्से की संपत्ति उसकी व्यक्तिगत संपत्ति मानी जा सकती है।

जैसलमेर की 75 बीघा जमीन का मामला

यह मामला राजस्थान के जैसलमेर की करीब 75 बीघा जमीन से जुड़ा है। यह जमीन सरकार ने चुतरा राम को राजस्थान लैंड रेवेन्यू एक्ट के तहत आवंटित की थी। 24 अप्रैल 2004 को चुतरा राम की बिना वसीयत मृत्यु हो गई। इसके बाद उनकी जमीन उनके तीन बेटों खेताराम, रामाराम और लच्छूराम के बीच बराबर हिस्सों में चली गई।

बेटे ने जमीन बेचने को दी चुनौती

करीब 21 साल बाद 17 अप्रैल 2025 को खेताराम ने अपने भाइयों के साथ मिलकर जमीन मध्य प्रदेश के एक खरीदार को बेच दी। इसके बाद खेताराम के बेटे देवाराम ने इस बिक्री को चुनौती दी। उसका दावा था कि जमीन में उसका भी 1/9 हिस्सा है और उसकी सहमति के बिना जमीन बेची नहीं जा सकती।

हाईकोर्ट ने खारिज की पोते की अपील

मामला राजस्थान हाईकोर्ट पहुंचा। 20 अगस्त 2026 को अदालत ने देवाराम की अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि देवाराम यह साबित नहीं कर पाया कि जमीन हिंदू अविभाजित परिवार यानी HUF की संपत्ति थी या उसके दादा ने इसे HUF के कर्ता के तौर पर रखा था।

धारा 8 के तहत मिली संपत्ति का क्या नियम?

अदालत ने कहा कि केवल दादा से बेटे और फिर पोते तक संपत्ति पहुंचने से वह अपने आप पैतृक संपत्ति नहीं बन जाती। अगर दादा की मृत्यु के बाद उनकी संपत्ति हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 के तहत बेटे को मिलती है, तो वह संपत्ति बेटे की व्यक्तिगत विरासत मानी जाती है। ऐसे में पिता के जीवित रहते बेटा उस संपत्ति पर सिर्फ जन्म के आधार पर अपना अधिकार नहीं मांग सकता।

नाबालिग होने की दलील भी नहीं मानी

देवाराम ने यह भी कहा था कि दादा की मृत्यु के समय वह नाबालिग था। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने साफ किया कि वारिस की उम्र चाहे जो हो, उत्तराधिकार खुलने पर संपत्ति कानून के अनुसार संबंधित वारिसों को मिलती है। इस आधार पर पोते को अपने पिता के हिस्से में जन्मसिद्ध अधिकार नहीं मिल जाता।

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