Bus Safety: महिलाओं और यात्रियों की सुरक्षा के लिए बसों में लगाए गए इमरजेंसी अलर्ट बटन को लेकर संसदीय समिति की रिपोर्ट में गंभीर सवाल उठाए गए हैं। हैरानी की बात यह है कि जिस बटन की कीमत करीब 15 से 20 रुपये है, उसका इस्तेमाल बेहद कम हो रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह बताई गई है कि अलर्ट मिलने के बाद तुरंत मदद पहुंचाने के लिए कई जगहों पर कोई प्रभावी रिस्पॉन्स सेंटर ही नहीं है।
निर्भया कांड के बाद अनिवार्य हुआ था बटन
बसों में इमरजेंसी अलर्ट बटन लगाने का नियम 2012 के निर्भया कांड के बाद लागू किया गया था। इसका मकसद खासतौर पर महिला यात्रियों को आपात स्थिति में तुरंत मदद उपलब्ध कराना था। नियम के तहत पिछले कई वर्षों से बसों में ये बटन लगाए जा रहे हैं।
₹15 के बटन की जांच में हजारों रुपये खर्च
बस ऑपरेटरों ने समिति को बताया कि इमरजेंसी बटन की कीमत भले ही सिर्फ 15 से 20 रुपये हो, लेकिन अनिवार्य फिटनेस टेस्ट के दौरान इसकी जांच के नाम पर प्रति वाहन 2,500 से 25,000 रुपये तक खर्च करना पड़ता है। ऑपरेटरों का कहना है कि जब इस सिस्टम का इस्तेमाल ही प्रभावी तरीके से नहीं हो रहा, तो बार-बार इसकी जांच के लिए इतनी बड़ी रकम लेना उचित नहीं है।
अलर्ट का जवाब देने के लिए सेंटर नहीं
एक बस ऑपरेटर ने बताया कि बटन दबाने के बाद अलर्ट तो जारी हो जाता है, लेकिन कई जगहों पर इसे रिसीव करने और कार्रवाई करने के लिए कोई खास सेंटर नहीं है। ऐसे में यात्रियों की सुरक्षा के लिए बनाया गया पूरा सिस्टम सवालों के घेरे में आ गया है।
कई राज्यों में 112 से जोड़ा गया सिस्टम
सड़क परिवहन मंत्रालय ने समिति को बताया कि कई राज्यों में इमरजेंसी अलर्ट सिस्टम को 112 इमरजेंसी नंबर से जोड़ा गया है। हालांकि, कई बार गलत अलार्म बजने की शिकायतें भी सामने आईं। इसके बाद कुछ राज्यों में इस सिस्टम को बंद कर दिया गया।
CCTV लगाने पर भी चर्चा
समिति के एक सदस्य ने सवाल उठाया कि अगर इमरजेंसी बटन प्रभावी नहीं है तो बसों में CCTV कैमरे क्यों नहीं लगाए जाते। मंत्रालय ने बताया कि नई बसों में CCTV लगाना अनिवार्य किया जा रहा है। वहीं, मंत्रालय इस इमरजेंसी अलर्ट सिस्टम को दोबारा प्रभावी तरीके से शुरू करने के पक्ष में है, जबकि बस ऑपरेटर इसे खत्म करने की मांग कर रहे हैं।
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