देश में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है रक्षाबंधन, जानें क्या है इतिहास

देश में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है रक्षाबंधन, जानें क्या है इतिहास

नई दिल्ली: भारत को त्योहारों का देश कहा जाता है,यहां समय-समय पर कोई त्योहार मनाया जाता है। इसही तरह भाई-बहन को दर्शाता एक त्योहार है। रक्षा बंधन वही इस साल रक्षाबंधन को 11 अगस्त 2022 को मनाया जाएगा। इसके अलावा रक्षाबंधन जैसे पवित्र त्योहार को देशभर में अलग-अलग नाम से जाना जाता है और इसी सन्दर्भ में हम आपके लिए रक्षा बंधन से जुड़ी रोचक जानकारी लेकर आये हैं।

बता दें कि रक्षाबंधन को भारत के पश्चिमी भाग में नारियल पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। वहीं इस दिन समुन्द्र के क्षेत्रों में रहने वाले मछुआरे इंद्र देव और वरूण देव की पूजा करते है। इस पूजा के दौरान समुन्द्र मे नारियल फेंके जाते है। दूसरी ओर उत्तर भारत में सावन पूर्णिमा के दिन को कजरी पूर्णिमा कहा जाता है। इस को किसानों के लिए बेहद शुभ माना जाता है क्योंकि इस दिन किसान देवी दुर्गा की पूजा कर उनसे अच्छी फसल की कामना करते है। वहीं गुजरात में रक्षाबंधन को पवित्रोपन्ना के नाम से जाना जाता है। इस अवसर में लोग रूई को गाय के दूध में डूबोकर शिवलिंग के चारों ओर बांधते है। इसके अलावा नेपाल के पहाड़ी इलाकों में ब्राहमण और क्षेत्रीय समुदाय मे रक्षा बन्धन गुरू और भागिनेय के हाथ से बांधा जाता है। लेकिन दक्षिण सीमा में रहने वाले भारतीय मूल के नेपाली भारतीयों की तरह बहन से राखी बंधवाते है।

रक्षाबंधन के दिन भाई को राखी बांधने से पहले स्नास करके एक थाली में रोली,चंदन,अक्षत,दही,मिठाई,शुद्ध घी का दीपक और अपने भाई के राशि के अनुसार धागे से बनी या फिर रेशम के धागे से बनी राखी रखें। इसके बाद अपने भाई को पूर्व या उत्तर दिशा में खड़ा कर दें। इसके बाद उसे तिलक लगाकर दाएं हाथ की कलाई में रक्षासूत्र या फिर कहें राखी बांधें। इसके बाद भाई की आरती उताकर मिठाई खिलाकर उसके उज्जवल भविष्य की कामना करें। रक्षाबंधन से जुड़ा एक इतिहास दिल को छू जाने वाला है। दरअसल, राजपूत जब युद्ध करने जाया करते थे उस समय राजघराने की महिलाएं उनके माथे पर तिलक के साथ-साथ कलाई में रेशम का धागा बांधा करती थी। जिससे यह विश्वास रहता था कि राजा युद्ध में विजयी होकर बिल्कुल सही सलामत वापस आ जाएंगे।

वहीं रक्षाबंधन से जुड़ी एक और कथा बेहद प्रसिद्ध है जिसमें एक बार बहादुरशाह ने मेवाड़ पर आक्रमण कर दिया था और रानी यह बात बहुत अच्छे तरह से जानती थी कि वह अकेले युद्ध करके नहीं जीत सकती है। जिसके बाद रानी ने अपनी प्रजा को बचाने के लिए मुगल बादशाह हुमायूं को एक पत्र और राखी भेज कर रक्षा की याचना की। हुमांयू एक मुसलमान था फिर भी उसने रानी कर्मावती की भेजी हुयी राखी की लाज रखी और बहादुरशाह से लड़ते हुए मेवाड़ की रक्षा की।

 

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