इस दरगाह के कारण भारतीय रेलवे को भी बदलना पड़ा था अपना रास्ता, जानें क्यों खास है ये दरगाह

इस दरगाह के कारण भारतीय रेलवे को भी बदलना पड़ा था अपना रास्ता, जानें क्यों खास है ये दरगाह

लखनऊ: भारत एक ऐसा देश है जहां हर धर्म के लोग एक साथ रहते है। उत्तरप्रदेश के लखनऊ यहां चारबाग रेलवे स्टेशन पर पटरियों के बीचों बीच कई साल पुरानी खम्मन पीर बाबा की एक दरगाह है, जिसे कोई आज तक मिटा नहीं सका है। इसके आगे पीछे से भले ही ट्रेंन गुजरती हो लेकिन इस दरगह पर इसका कोई फर्क नहीं पड़ता है। यहां हर गुरुवार अनकों लोगों आकर पूजा और बाबा पर चदर चढ़ाते है। ये दरगाह देश के लिए गंगा, यमुना की तहजीब मानी जाती है।

बता दें, इस दरगह पर इबाबत करने न सिर्फ उत्तर प्रदेश के लोग बल्कि विदेश से भी  लोग यहां आकर मन्नत मागते है। मान्याता है कि यहां मागी गई हर मुराद पूरी होती हैं और तब यहां ताला, घड़ी और चादर चढ़ाई जाती है। 

अंग्रेज भी नहीं तोड़ पाए ये दरगाह

दरगह की देख रेख करने वाले मीडिया को बताते है कि ये दरगह अंग्रेजो के जमाने की है। जब अंग्रेज यहां हुकूमत किया करते थे तब यहां रेलवे ट्रैक बिछाने का काम हुआ था। तब कुछ यहां अजीबोगरीब वाक्य हुआ जिसकों देख और सुनकर सब हैरान थे। अंग्रेज जब सुबह यहां पटरियां बिछा कर जाते, अगले दिन वो पटरी उखड़ कर गिरी नजर आती। यह सिलसिला लगभग एक हफ्ते तक चला। उन्होंने बताया की अंग्रेज़ी हुकूमत के चीफ इंजीनियर जब काफी परेशान हो गए थे तब, कहा जाता है चीफ इंजीनियर के सपने में आकर बाबा ने बताया कि यहां उनकी आरामगाह है। छेड़छाड़ बिल्कुल भी न करें। इसी के बाद अंग्रेज़ी सरकार ने बाबा की दरगाह के हिस्से को छोड़कर पटरियों को मोड़कर बिछाया।

यहां हुआ करता था जंगल

वो बताते है कि अंग्रेजो के ज़माने से पहले यहां भदेवा नाम का जंगल हुआ करता था। यह दरगाह एक से दो एकड़ में फैली है। हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई सभी धर्म के लोग यहां आते हैं और मुरादें मांगते हैं। यहां हर गुरुवार सुबह 5 से लेकर रात 10 बजे तक हज़ारों ज़ायरीन आते हैं। इमाम के मुताबिक इस दरगाह का पूरा नाम शरीफ शाह शायद कयामुद्दीन है। साथ ही यहां विशेष तौर पर रेवड़ियां चढ़ाई जाती हैं।

 

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