आखिर क्यों की जाती है छठ पूजा? जानें क्या कहती है पौराणिक कथाएं

आखिर क्यों की जाती है छठ पूजा? जानें क्या कहती है पौराणिक कथाएं

नई दिल्ली: कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथइ को छठ पूजा का पर्व मनाया जाता है। इस वर्ष यानि 2020 में छठ की पूजा 20 नवंबर को की जाएगी। यह चार दिवसीय पर्व संतान की खुशहाली और अच्छे जीवन की कामना से किया जाता है। सूर्यापासना का यह अनुपम पर्व है। इस व्रत को महिलाओं के साथ पुऱूष भी समान रूप से करते है। इस पर्व की शुरूआत कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से होती है और कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मुख्य पूजा के बाद सप्तामी की सुबह सूर्य को अर्घ्य देने के पश्चात पर्व का समापन होता है। यह व्रत अत्यंत ही कठिन होता है क्योंकि इस व्रत में पूरे 36 घंटे तक व्रती बिना कुछ खाए पीए रहता है, लेकिन क्या आपको छठ पूजा का इतिहास पता है।

पौराणिक कथा के अनुसार प्रियंवद नाम के राजा की कोई संतान नहीं थी। तब उन्होंने संतान प्राप्ति के लिए यज्ञ करवाया। महर्षि कश्यप ने पुत्र की प्राप्ति के लिए यज्ञ करने के पश्चात प्रियंवद की पत्नी मालिनी को आहुति के लिए बनाई गई खीर प्रसाद के रुप में दी। जिससे उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई, परंतु दुर्भाग्यवश वह पुत्र मरा हुआ पैदा हुआ। तब राजा प्रियंवद का हृदय अत्यंत द्रवित हो उठा। वे अपने पुत्र को लेकर श्मशान गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे। उसी समय ब्रह्मा की मानस पुत्री देवसेना प्रकट हुईं और उन्होंने राजा से कहा कि वो उनकी पूजा करें। ये देवी सृष्टि की मूल प्रवृति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हैं, इसी कारण ये षष्ठी या छठी मइया कहलाती हैं। राजा ने माता के कहे अनुसार पुत्र इच्छा की कामना से देवी षष्ठी का व्रत किया, जिससे उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई। कहते हैं कि इसलिए संतान प्राप्ति और संतान के सुखी जीवन के लिए छठ की पूजा की जाती है।

वहीं एक अन्य कथा के मुताबिक छठ पर्व का आरंभ महाभारत काल के समय में हुआ था। कहा जाता है कि इस पर्व की शुरुआत सबसे पहले सूर्यपुत्र कर्ण ने सूर्य की पूजा करके की थी। कर्ण प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में खड़े रहकर सूर्य पूजा करते थे एवं उनको अर्घ्य देते थे। सूर्यनारायण की कृपा और तेज से ही वह महान योद्धा बने। इसलिए आज भी छठ में सूर्य को अर्घ्य देने परंपरा चली आ रही है। इस संबंध में एक कथा और मिलती है कि जब पांडव अपना सारा राज-पाठ कौरवों से जुए में हार गए, तब दौपदी ने छठ व्रत किया था। इस व्रत से पांडवों को उनका पूरा राजपाठ वापस मिल गया था। लोक प्रचलित मान्यताओं के अनुसार सूर्य देव और छठी मईया भाई-बहन हैं। इसलिए छठ के पर्व में छठी मईया के साथ सूर्य की आराधना फलदायी मानी गई है।

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