जब एक तरबूज के लिए खेली गई थी खून की होली, गंवानी पड़ी थी हजारों सैनिकों को अपनी जान

जब एक तरबूज के लिए खेली गई थी खून की होली, गंवानी पड़ी थी हजारों सैनिकों को अपनी जान

नई दिल्ली: दुनिया में अगल-अगल मुद्दों को लेकर कई लड़ाईयां लड़ी गई है जिसमे से कुछ देशों के लिए गर्व महशूश करवाते है। तो कुछ ऐसी भी है जो आज तक समझ में नहीं आती है कि आखिर ये युद्ध ही क्य़ों। ऐसे में आज हम आपको एक ऐसे युद्ध के बारे में बताएंगे। जो एक तरबूज के लिए हजारों सैनिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी।

दुनिया में इस युद्ध को मतीरे की राड़ से जाना जाता है। वो इसलिए क्योंकि राजस्थान में तरबूज को कुछ हिस्सों मे मतीरा कहा जाता हो तो वहीं झगड़े को राड़ कहा जाता है। ये युद्ध सन्न 1644 में लड़ा गया था। बताया जाता है कि बीकानेर रियासत का सीलवा गांव और नागौर रियासत का जाखणियां गांव एक दूसरे से सटे हुए थे। तरबूज का एक पौधा बीकानेर रियासत की सीमा में उगा, तो वहीं उसका एक फल नागौर रियासत की सीमा पर चला गया। रियासत लोगों का कहना था कि तरबूज का पौधा उनकी सीमा में है तो फल उनका हुआ तो वहीं नागौर रियासत के लोगो का कहना था कि फल उनकी सीमा पर आ गया तो उनका हुआ। जिसके बाद दोनों रियासतो के बीच झगड़ा हो गया, और देखते-देखते ये झगड़ा खूनी युद्ध में तब्दील जा हुआ।

कहा जाता है कि इस युद्ध में बीकानेर की सेना का नेतृत्व रामचंद्र मुखिया ने किया था। वहीं नागौर की सेना का नेतृत्व सिंघवी ने किया था। हैरानी की बात ये कि युद्ध की शुरूआत हो चुकी थी लेकिन दोनों रियासतों के राजा को इसके बारे में भनक नही थी। वहीं जब इस युद्ध के बारे में उन्हें जानकारी हुई तो उन्होंने मुगल दरबार से इसमें हस्तक्षेप करने की मांग की। हालांकि तब तक बहुत देर हो चुकी थी। कहा जाता है कि इस युद्ध में हार नागौर को मिली, लेकिन दोनों रियासतों से हजारो सैनिक मारे गए थे।

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