
Vandemataram Circular: सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने बुधवार, 25 मार्च को ‘वंदे मातरम्’ गाने को लेकर दाखिल एक याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि यह याचिका “समय से पहले” दायर की गई है और इसमें भेदभाव की आशंका सिर्फ अंदेशों पर आधारित है। यह याचिका मोहम्मद सईद नूरी की ओर से दाखिल की गई थी, जिसमें गृह मंत्रालय के उस सर्कुलर को चुनौती दी गई थी, जिसमें सरकारी कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ गाने की बात कही गई है।
याचिकाकर्ता के वकील ने दी दलील
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली भी शामिल थे। उन्होंने साफ कहा कि ये निर्देश अनिवार्य नहीं है। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े ने याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी कि देश में सभी धर्मों का सम्मान किया जाता है, लेकिन अगर किसी को उसकी आस्था के खिलाफ ‘वंदे मातरम्’ गाने के लिए मजबूर किया जाता है, तो यह “निष्ठा के सामाजिक प्रदर्शन” जैसा दबाव बन सकता है।
जस्टिस बागची ने पूछा सवाल
इस पर जस्टिस बागची ने पूछा कि क्या सर्कुलर में ऐसा कोई प्रावधान है, जिसमें गाना न गाने पर सजा का प्रावधान हो या किसी को कार्यक्रम से हटाया गया हो? जवाब में हेगड़े ने कहा कि भले ही कानूनी सजा न हो, लेकिन सामाजिक दबाव जरूर बनता है। मुख्य न्यायाधीश ने भी सवाल किया कि क्या याचिकाकर्ता को ऐसा कोई नोटिस मिला है, जिसमें उन्हें गाने के लिए मजबूर किया गया हो।
यह वैकल्पिक है- कोर्ट
अदालत ने कहा कि सरकार के निर्देश में ‘may’ शब्द का इस्तेमाल किया गया है, यानी यह वैकल्पिक है। इसका मतलब है कि किसी को गाना है या नहीं, यह उसकी स्वतंत्रता पर निर्भर करता है। बेंच ने स्पष्ट किया कि अगर भविष्य में किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई होती है या उसे मजबूर किया जाता है, तो वह अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है। फिलहाल, यह याचिका केवल “अस्पष्ट आशंका” पर आधारित है, इसलिए इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता
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