Success Story: "मुश्किलें दिल के इरादे आजमाती हैं, स्वप्न के परदे निगाहों से हटाती हैं, हौसला मत हार गिरकर ओ मुसाफिर, ठोकरें ही तो इंसान को चलना सिखाती हैं।" यह पंक्तियां उत्तर प्रदेश कैडर के आईपीएस अधिकारी प्रताप गोपेंद्र के जीवन पर पूरी तरह सटीक बैठती हैं। सीमित संसाधनों, आर्थिक तंगी और लगातार असफलताओं के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और अपने दृढ़ संकल्प के दम पर भारतीय पुलिस सेवा (IPS) में जगह बनाकर लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा बन गए।
गाय-भैंस चराते हुए बीता बचपन
ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े प्रताप गोपेंद्र का बचपन बेहद साधारण परिस्थितियों में गुजरा। उन्होंने बचपन में गाय-भैंस चराने का काम किया और संसाधनों की कमी के बीच अपनी शुरुआती शिक्षा पूरी की। आठवीं कक्षा तक उन्होंने बोरी पर बैठकर पढ़ाई की। उस समय न कोई बड़ा सपना था और न ही भविष्य की स्पष्ट दिशा, लेकिन संघर्षों ने उन्हें जीवन में आगे बढ़ने का साहस दिया।
सीमित आय में परिवार ने देखा बड़ा सपना
प्रताप गोपेंद्र के पिता गांव में एक छोटी डिस्पेंसरी चलाते थे। परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी, लेकिन शिक्षा के महत्व को समझते हुए उन्होंने अपने बेटे को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। इंटरमीडिएट के बाद करियर को लेकर वह असमंजस में थे, लेकिन उन्होंने वाराणसी के उदय प्रताप कॉलेज से बीएससी की पढ़ाई पूरी की।
ग्रेजुएशन के बाद उन्होंने सिविल सेवा में जाने का लक्ष्य तय किया और संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) तथा उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPPCS) की तैयारी शुरू कर दी। वर्ष 2005 में वह तैयारी के लिए इलाहाबाद (अब प्रयागराज) पहुंचे, जहां उनके संघर्ष का नया अध्याय शुरू हुआ।
विषय बदलने का फैसला बना टर्निंग प्वाइंट
तैयारी के शुरुआती दौर में उन्होंने जूलॉजी और बॉटनी विषय चुने थे, लेकिन इनमें अपेक्षित आत्मविश्वास विकसित नहीं हो पाया। परिस्थितियों का आकलन करते हुए उन्होंने विषय बदलने का कठिन निर्णय लिया और दोस्तों की सलाह पर इतिहास तथा दर्शनशास्त्र को वैकल्पिक विषय के रूप में चुना।
यही निर्णय आगे चलकर उनके करियर का महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। नए विषयों के साथ उन्होंने पूरी मेहनत और धैर्य के साथ तैयारी जारी रखी।
कोचिंग फीस के लिए भी करनी पड़ी जद्दोजहद
आर्थिक तंगी उनके संघर्ष का सबसे बड़ा हिस्सा थी। इतिहास विषय की कोचिंग के लिए उनसे 3,000 रुपये फीस मांगी गई थी, जो बाद में 2,500 रुपये कर दी गई। हालांकि, उस समय एकमुश्त इतनी राशि जुटाना भी उनके लिए आसान नहीं था। उन्होंने यह फीस पांच किस्तों में जमा की।
इसी दौरान दर्शनशास्त्र के एक शिक्षक ने उनके उत्तर लेखन की सराहना की। यह पहला अवसर था जब उन्हें विश्वास हुआ कि वे भी यूपीएससी जैसी कठिन परीक्षा में सफलता हासिल कर सकते हैं।
असफलताओं के बाद भी नहीं मानी हार
सिविल सेवा परीक्षा की राह आसान नहीं थी। उन्हें कई बार असफलताओं का सामना करना पड़ा। वर्ष 2008 में उन्होंने पहली बार यूपीएससी की प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा सफलतापूर्वक पास कर ली, लेकिन इंटरव्यू में चयन नहीं हो सका।
यह असफलता किसी भी अभ्यर्थी का मनोबल तोड़ सकती थी, लेकिन प्रताप गोपेंद्र ने हार मानने के बजाय अपने अंतिम प्रयास तक संघर्ष जारी रखने का फैसला किया। उनकी दृढ़ता और मेहनत आखिरकार रंग लाई और उन्होंने यूपीएससी परीक्षा उत्तीर्ण कर भारतीय पुलिस सेवा में स्थान हासिल कर लिया।
आज DIG के पद पर दे रहे हैं सेवाएं
प्रताप गोपेंद्र वर्ष 2012 बैच के उत्तर प्रदेश कैडर के आईपीएस अधिकारी हैं। वर्तमान में वह पुलिस उप-महानिरीक्षक (DIG) के पद पर कार्यरत हैं।