Range Rover Electric: लग्जरी SUV बनाने वाली Range Rover ने अपनी पहली पूरी तरह इलेक्ट्रिक SUV पेश कर दी है। कंपनी के लिए यह इलेक्ट्रिक मोबिलिटी की दिशा में एक बड़ा कदम है। नई Range Rover Electric में कंपनी ने अपने पुराने मॉडल की लग्जरी और दमदार डिजाइन को बरकरार रखते हुए पूरी तरह इलेक्ट्रिक पावरट्रेन दिया है। भारत में इस SUV की बुकिंग भी शुरू हो गई है। भारत में ग्राहक Range Rover Electric के Standard Wheelbase Autobiography और First Edition वेरिएंट बुक कर सकते हैं। इसके अलावा Long Wheelbase में SV, SV Ultra और SV Black वेरिएंट भी उपलब्ध होंगे। कंपनी ने इसे खासतौर पर लग्जरी के साथ दमदार इलेक्ट्रिक परफॉर्मेंस देने के लिए तैयार किया है।
118.5 kWh की बैटरी और 542 HP की पावर
Range Rover Electric में 118.5 kWh की usable lithium-ion बैटरी दी गई है। इसमें 344 प्रिजमैटिक सेल का इस्तेमाल किया गया है और SUV को 800V इलेक्ट्रिकल आर्किटेक्चर मिलता है। इसमें दो Permanent Magnet इलेक्ट्रिक मोटर लगी हैं, जो मिलकर 542 hp की पावर और 850 Nm का टॉर्क पैदा करती हैं। कंपनी का दावा है कि SUV एक बार फुल चार्ज होने पर 600 किलोमीटर तक की WLTP रेंज दे सकती है।
350kW फास्ट चार्जिंग सपोर्ट
Range Rover Electric में 350kW तक की DC फास्ट चार्जिंग का सपोर्ट दिया गया है। कंपनी के अनुसार, compatible fast charger से SUV को 10 से 80 प्रतिशत तक चार्ज करने में करीब 22 मिनट लग सकते हैं। वहीं, 10 मिनट की चार्जिंग से करीब 125 मील तक की EPA-estimated ड्राइविंग रेंज मिल सकती है।
ऑफ-रोडिंग में भी नहीं होगी कमी
इलेक्ट्रिक होने के बावजूद Range Rover ने SUV की ऑफ-रोड क्षमता से समझौता नहीं किया है। इसमें नया Traction Management System दिया गया है, जो सिर्फ 50 मिलीसेकंड में प्रतिक्रिया कर सकता है। यह अलग-अलग रास्तों और सतहों पर बेहतर ग्रिप बनाए रखने में मदद करता है। SUV करीब 35 इंच गहरे पानी से गुजर सकती है और 45 डिग्री तक की चढ़ाई पर चढ़ने में सक्षम है। इसमें Single-Pedal Driving Mode और Twin-Chamber Air Suspension भी दिया गया है। इलेक्ट्रिक पावरट्रेन के कारण इसका सेंटर ऑफ ग्रेविटी भी कम है।
38 बार धरती का चक्कर जितनी टेस्टिंग
Land Rover के मुताबिक, Range Rover Electric को तैयार करने के दौरान बड़े पैमाने पर टेस्टिंग की गई है। SUV ने फिजिकल टेस्टिंग में कुल इतनी दूरी तय की, जो धरती के चारों ओर 38 बार चक्कर लगाने के बराबर है। इसके अलावा इंजीनियरों ने 2.5 लाख घंटे से ज्यादा की वर्चुअल टेस्टिंग भी की है।
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