SC on UPI transactions fees: सुप्रीम कोर्ट ने आज 28 सितंबर 2026 सोमवार को 2,000 रुपये से ज्यादा के वाणिज्यिक UPI लेनदेन पर प्रस्तावित शुल्कों के फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। इस पूरे मामले में कोर्ट ने शुल्कों के कानूनी आधार और स्वरूप पर सवाल उठाते हुए पूछा कि अंततः भुगतान किसे मिलता है और क्या इस राशि को शुल्क कहा जा सकता है। इसके लिए कोर्ट ने केंद्र सरकार को एक नोटिस जारी करते हुए 4 हफ्तों में जवाब देने का निर्देश दिया है।
बता दें, भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और वी मोहना की पीठ ने केंद्र सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (NPCI) से उन दो राजपत्र अधिसूचनाओं को चुनौती देने वाली याचिका पर जवाब मांगा, जिनमें शुल्कों की घोषणा की गई थी और ऐसी शुल्कों की प्रक्रिया का वर्णन किया गया था।
कोर्ट ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान, न्यायमूर्ति बागची ने प्रतिवादियों से शुल्क के स्वरूप पर सवाल किया और प्रतिवादी अधिकारियों का प्रतिनिधित्व कर रहे वकीलों से पूछा 'भुगतान किसे मिलता है? शुल्क किसे मिलता है?' न्यायालय ने शुल्क लगाने वाले कार्यकारी प्राधिकरण पर भी सवाल उठाया और पूछा 'इस तरह के अधिग्रहण का कार्यकारी दायरा क्या है? यदि यह शुल्क नहीं है, तो इस शुल्क का स्वरूप क्या है?'
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इसके बाद न्यायालय ने आयकर अधिनियम के प्रावधानों के संदर्भ में इस मुद्दे की जांच की और प्राप्ति की प्रकृति पर प्रश्न उठाया। न्यायालय ने धारा 269 का हवाला देते हुए पूछा कि किसके हाथों में यह राशि आय का हिस्सा बनेगी। न्यायालय ने धारा 269एसयू का भी हवाला दिया, जो भुगतान के विशिष्ट इलेक्ट्रॉनिक तरीकों की अनुमति देती है, और लेन-देन में शामिल संस्थाओं के बीच धन के हस्तांतरण की जांच की। अदालत यह जानना चाहती थी कि यूपीआई लेनदेन से प्राप्त राशि वास्तव में किसे मिलती है। वकील ने जवाब दिया कि यह राशि भुगतान प्रणाली के दोनों पक्षों - एग्रीगेटर या सेवा प्रदान करने वाले बैंकों - को मिलती है।
मामले में वकील ने क्या कहा?
ये सवाल तब उठे जब न्यायालय ने UPI लेनदेन में शुल्क वसूलने की प्रक्रिया और अंततः धन किसे प्राप्त होता है, इसकी जाँच की।
मामले में प्रतिवादी पक्षों में से एक के वकील ने डेबिट और क्रेडिट कार्ड लेनदेन से तुलना करते हुए UPI प्रक्रिया को समझाया। उन्होंने बताया कि UPI लेनदेन में कई हितधारकों को एक साथ काम करना होता है, जिनमें भुगतानकर्ता और प्राप्तकर्ता के बैंक और भुगतान प्रणाली को सुगम बनाने वाले ऑपरेटर शामिल हैं।
वकील ने लेनदेन संरचना को समझाते हुए कहा 'दो बैंक, एक समन्वय एजेंसी, एक भुगतानकर्ता, एक प्राप्तकर्ता।' उन्होंने कहा कि लेनदेन पूरा करने के लिए सभी हितधारकों को एक मंच पर एकत्रित होना पड़ता है और तर्क दिया कि सेवा शुल्क मूल रूप से उस सेवा को प्रदान करने की लागत को साझा करने का एक तंत्र है। वकील ने कहा 'UPI डेबिट-क्रेडिट कार्ड से अलग नहीं है।'
न्यायालय ने यह भी जाँच की कि क्या एकत्रित राशि को वैधानिक शुल्क माना जा सकता है या यह भुगतान सेवा से उत्पन्न शुल्क है। इस पर वकील ने बताया कि यह राशि भारत सरकार द्वारा किया गया वैधानिक संग्रह नहीं है। उन्होंने कहा कि NPCI केवल लेन-देन को सुगम बनाती है और केंद्र सरकार द्वारा राशि का कोई हिस्सा नहीं लिया जा रहा है।
4 हफ्तों में मांगा जवाब
कोर्ट ने अब केंद्र सरकार से सुनवाई के दौरान उठाए गए सवालों के जवाब में हलफनामा मांगा है। RBI और NPCI से भी शुल्कों की प्रकृति और संचालन के संबंध में जवाब मांगा गया है। प्रतिवादियों को अपने प्रति-हलफनामे दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया गया है।