
Rajendra Chola 1: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज 27 जुलाई को तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली में गंगईकोंडा चोलपुरम मंदिर में आयोजित आदि तिरुवथिरई उत्सव के समापन समारोह में शामिल हुए। साथ ही, महान चोल सम्राट राजेंद्र चोल प्रथम की जयंती समारोह में भाग भी लिया। साथ ही, इस खास अवसर पर वे चोल साम्राज्य के महान सम्राट राजेंद्र चोल प्रथम की जयंती के उपलक्ष्य में एक स्मारक सिक्का भी जारी किया।
आदि तिरुवथिरई उत्सव का महत्व
आदि तिरुवथिरई उत्सव तमिल शैव भक्ति परंपरा का एक जीवंत उत्सव है। जिसे चोल वंश ने उत्साहपूर्वक संरक्षित और प्रोत्साहित किया था। यह उत्सव राजेंद्र चोल प्रथम के जन्म नक्षत्र, तिरुवथिरई (आर्द्रा) के साथ संयोग होने के कारण इस वर्ष और भी विशेष है। उत्सव में तमिल कला और संस्कृति की समृद्ध परंपराओं का प्रदर्शन किया जाएगा। जिसमें थेरुकुथु, थप्पट्टम, करगम, कावड़ी जैसे लोकनृत्य, भरतनाट्यम और अन्य नाट्य प्रस्तुतियां शामिल होंगी। समापन समारोह में कलाक्षेत्र फाउंडेशन द्वारा एक विशेष भरतनाट्यम प्रदर्शन और पारंपरिक ओथुवरों द्वारा देवराम थिरुमुराई का गायन होगा। इसके अलावा, साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित देवराम भजनों की एक पुस्तिका का विमोचन भी होगा।
राजेंद्र चोल प्रथम का योगदान
राजेंद्र चोल प्रथम (1014-1044 ई.) चोल साम्राज्य के सबसे प्रभावशाली शासकों में से एक थे, जिन्होंने दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में अपने साम्राज्य का विस्तार किया। उनके नेतृत्व में चोल नौसेना ने श्रीलंका, मालदीव और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों जैसे श्रीविजय तक समुद्री अभियान चलाए। उनकी विजयों ने चोल साम्राज्य को समृद्धि और सांस्कृतिक वैभव के शिखर पर पहुंचाया। गंगईकोंडा चोलपुरम मंदिर और चोगंगम झील जैसे उनके स्थापत्य योगदान आज भी उनकी दूरदर्शिता और भव्यता का प्रतीक हैं। इस उत्सव के माध्यम से उनकी विरासत को सम्मानित किया जा रहा है।
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