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मोबाइल की लत बना रही दिमाग को कमजोर, रिसर्च में खुले सारे राज

मोबाइल की लत बना रही दिमाग को कमजोर, रिसर्च में खुले सारे राज

Mobile Addiction: आज की तेज रफ्तार वाली दुनिया में स्मार्टफोन हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसकी लत हमें मानसिक रूप से बीमार बना रही है? दरअसल, 2025में प्रकाशित अध्ययनों ने इस समस्या पर गंभीर चेतावनी दी है। मोबाइल एडिक्शन न केवल नींद को प्रभावित करता है, बल्कि अवसाद, चिंता और यहां तक कि आत्महत्या के विचारों को भी बढ़ावा देता है।

मोबाइल एडिक्शन का फैलाव

मोबाइल एडिक्शन, या स्मार्टफोन निर्भरता वह स्थिति है जब व्यक्ति फोन के बिना असहज महसूस करता है और ना चाहते हुए भी इसका इस्तेमाल करता है। 2025के आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका में औसतन लोग रोजाना 5घंटे 16मिनट फोन पर बिताते हैं, जो पिछले साल से 14%ज्यादा है। लगभग 87%लोग सोने या जागने के एक घंटे के अंदर फोन चेक करते हैं और 69%जागते ही पहले पांच मिनट में। युवाओं में यह समस्या और गंभीर है, जहां 85%किशोरों को फोन इस्तेमाल रोकना मुश्किल लगता है। इससे न केवल शारीरिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है, बल्कि दिमागी तौर पर भी गहरा असर पड़ता है।

दिमागी स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव

हालिया अध्ययनों ने साफ कर दिया है कि मोबाइल एडिक्शन कुल स्क्रीन टाइम से ज्यादा, लत की प्रवृत्ति पर निर्भर करता है। एक अध्ययन में पाया गया कि स्मार्टफोन का अत्यधिक इस्तेमाल दिमाग के रिवॉर्ड सर्किट को सक्रिय करता है, जो डोपामाइन बढ़ाता है और आवेग नियंत्रण कम करता है। इससे अवसाद का खतरा बढ़ जाता है, खासकर किशोरों में। हफ्ते में 6-9घंटे फोन इस्तेमाल करने वाले युवा अधिक उदास महसूस करते हैं और रोजाना 2घंटे से ज्यादा इस्तेमाल से जोखिम और बढ़ता है। यह एक द्विपक्षीय संबंध है: लत से अलगाव और नकारात्मक तुलनाएं बढ़ती हैं, जो अवसाद को गहरा करती हैं, जबकि अवसाद से बचने के लिए लोग फोन की शरण लेते हैं।

चिंता (एंग्जायटी) भी एक बड़ा मुद्दा है। लगातार उत्तेजना और तनाव से चिंता बढ़ती है और मेटा-एनालिसिस में पाया गया कि अत्यधिक इस्तेमाल चिंता के स्तर को ऊंचा करता है। नींद की समस्याएं तो और भी डरावनी हैं। फोन की ब्लू लाइट मेलाटोनिन उत्पादन रोकती है, जिससे नींद 2-3घंटे देर से आती है और टूट-टूट कर होती है। एक अध्ययन में पाया गया कि सप्ताह में 63घंटे से ज्यादा स्क्रीन टाइम वाले लोगों में नींद की गुणवत्ता खराब होने का जोखिम 22%अधिक होता है, और नींद की अवधि 15मिनट कम। इससे भावनात्मक अस्थिरता बढ़ती है, जो आगे चलकर मानसिक बीमारियों को जन्म देती है।

युवाओं और बच्चों पर प्रभाव और भी चिंताजनक है। 2025में प्रकाशित एक अध्ययन में 9-10साल के करीब 4,300युवाओं को चार साल तक ट्रैक किया गया। इसमें पाया गया कि सोशल मीडिया, मोबाइल या वीडियो गेम्स की लत से आत्महत्या के विचारों का जोखिम दोगुना हो जाता है। कुल स्क्रीन टाइम से कोई संबंध नहीं, लेकिन लत बढ़ने पर चिंता, अवसाद और आक्रामकता 2-3गुना बढ़ जाती है। एक अन्य रिसर्च में 163देशों के 2मिलियन लोगों के डेटा से पता चला कि 13साल से कम उम्र के बच्चों में स्मार्टफोन इस्तेमाल से आत्महत्या के विचार, भावनात्मक नियंत्रण की कमी, कम आत्मसम्मान और वास्तविकता से अलगाव बढ़ता है, खासकर लड़कियों में। हर साल पहले फोन मिलने से मानसिक स्वास्थ्य और खराब होता है। कारणों में सोशल मीडिया एक्सेस, साइबरबुलिंग, नींद की कमी और पारिवारिक संबंधों में गिरावट शामिल हैं।

डराने वाले आंकड़े और कारण

2025 के आंकड़ों से पता चलता है कि 67% किशोर फोन इस्तेमाल से नींद खो देते हैं और 71% फोन को बिस्तर के पास रखते हैं। 5 घंटे से ज्यादा रोजाना इस्तेमाल से आत्महत्या के जोखिम कारक 71% बढ़ जाते हैं। 70% लोग 'नोमोफोबिया' (फोन कनेक्टिविटी खोने का डर) से पीड़ित हैं, जो कॉलेज छात्रों में सबसे ज्यादा है। 33% ऑनलाइन सोशलाइजिंग को पसंद करते हैं। ये आंकड़े बताते हैं कि मोबाइल एडिक्शन न केवल व्यक्तिगत, बल्कि सामाजिक स्तर पर समस्या पैदा कर रहा है, जैसे दोस्तों के साथ बातचीत में बाधा और ध्यान भटकाव।

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