
नई दिल्ली: साल के अधिकतर दिनों में हम कोई न कोई दिवस जरूर मनाते है। ये अधिकतर स्वास्थ्य, पर्यावरण या फिर कमजोर तबके लिए होते हैं। कुछ दिवस बच्चों से संबंधित होते है। जिनमें एक है आक्रामकता का शिकार हुए मासूम बच्चों का अंतरराष्ट्रीय दिवस है। पूरे विश्व में 4जून को आक्रमण के शिकार हुए मासूम बच्चों का अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाया जाता है। इस दिवस को मनाते हुए देश एवं दुनिया के मासूम बच्चे जो शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और घरेलू शोषण का शिकार हुए हैं, उन्हें उनके कानूनों के प्रति जागरूक किया जाता है एवं उनकी खुशहाल जिन्दगी को सुनिश्चित किया जाता है।
बता दें कि शुरू में यह दिवस युद्ध के हालात के शिकार हुए बच्चों के लिए मनाया जाता था, लेकिन बाद में इसके उद्देश्यों को दुनिया भर में शारिरिक मानसिक और भावनात्मक दुर्वयवहार से पीड़ित बच्चों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए प्रयास करना शामिल कर लिया गया। दुनिया में सभी जगहों पर बच्चों को देश के भविष्य के रूप में देखा जाता है. लेकिन उनका यह बचपन रूपी भविष्य आज हिंसा, शोषण, यौन विकृतियों, अभाव, उपेक्षा, नशे एवं अपराध के दलदल में धसता जा रहा है.
यह सयुंक्त राष्ट्र द्वारा बच्चों के अधिकारों एवं जीवन-सुरक्षा से जुड़े प्रतिबद्धता को दर्शाता है. सयुंक्त राष्ट्र द्वारा इसकी शुरूआत 19अगस्त 1982को हुई थी। इसकी आवश्यकता मूल रूप से 1982लेबनान युद्ध के पीड़ित बच्चों पर केंद्रित है. बड़ी संख्या में निर्दोष फिलिस्तीन और लेबनान के बच्चें इजराइल की हिंसा में युद्ध का शिकार होना पड़ा था और फिलिस्तीन ने संयुक्त राष्ट्र से इस बारे में कदम उठाने का आग्रह किया था। इसी हिंसा का ध्यान रखते हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 4जून को इंटरनेशन डे ऑफ इनोसेंट चिल्ड्रन ऑफ एग्रेशन को मनाने का फैसला किया।
पिछले कुछ वर्षों में आतंकवादी हमलों, युद्ध, हिंसक क्षेत्रों में, कोरोना महामारी के कारण बच्चों के शोषण की संख्या में वृद्धि हुई है। इन क्षेत्रों में रहने वाले करीब 250मिलीयन बच्चें इन सब चीजों का शिकार हो रहे है। इन बच्चों के भविष्य के लिए अधिक प्रयास करने की आवश्यकता है। सयुंक्त राष्ट्र के नियमों में पहले तो बच्चों के खिलाफ हिंसा के सभी रूपों को समाप्त करने के लिए एक विशिष्ट लक्ष्य शामिल था, और बच्चों के दुव्र्यवहार, उपेक्षा और शोषण को समाप्त करने के लिए कई अन्य हिंसा-संबंधी लक्ष्यों को मुख्यधारा में शामिल किया।
बचपन इतना उपेक्षित, प्रताड़ित, डरावना एवं भयावह हो जायेगा, किसी ने आज से पहले कल्पना तक नहीं की थी. बचपन के प्रति न केवल अभिभावक, बल्कि समाज और सरकार इतनी बेपरवाह हो गया है। विश्वस्तर पर बालकों के उन्नत जीवन के ऐसे आयोजनों के बावजूद आज भी बचपन उपेक्षित, प्रताड़ित एवं नारकीय बना हुआ है, आज बच्चों की इन बदहाल स्थिति की प्रमुख वजहें है, वे हैं-सरकारी योजनाओं का कागज तक ही सीमित रहना, बुद्धिजीवी वर्ग व जनप्रतिनिधियों की उदासीनता, इनके प्रति समाज का संवेदनहीन होना एवं गरीबी, शिक्षा व जागरुकता का अभाव है।
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