क्या थी NAC? जिसे लैटरल एंट्री हंगामें के बीच गिना रही BJP; कहा जाता था सोनिया की सुपर कैबिनेट

क्या थी NAC? जिसे लैटरल एंट्री हंगामें के बीच गिना रही BJP; कहा जाता था सोनिया की सुपर कैबिनेट

Lateral Entry Controversy: यूपीएससी के जरिए लेटरल एंट्री के जरिए उच्च पदों पर नियुक्ति के मामले में केंद्र सरकार ने यू-टर्न ले लिया है। कार्मिक विभाग के राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने यूपीएससी को पत्र लिखकर फैसला वापस लेने को कहा है। यूपीएससी के इस विज्ञापन से पूरे देश में हंगामा मच गया। विपक्ष ने इस विज्ञापन को संविधान, दलितों और आदिवासियों के अधिकारों से जोड़ा। सरकार के सहयोगी दल भी इस मुद्दे पर खुलकर मैदान में उतर आये। आख़िरकार 72 घंटे तक चली रस्साकशी के बाद केंद्र ने इस आदेश को वापस लेने की घोषणा की।

बता दें कि, कार्मिक मंत्री जितेंद्र सिंह ने यूपीएससी अध्यक्ष प्रीति सूदन को पत्र लिखकर अधिसूचना वापस लेने को कहा था। इस पत्र में उन्होंने 2005 में यूपीए सरकार द्वारा शुरू की गई लेटरल एंट्री की परंपरा के बारे में बात की थी। इसके अलावा सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद का भी जिक्र किया गया था और बताया गया था कि कैसे इसके जरिए पीएमओ को नियंत्रित किया जाता था और वह सुपर- ब्यूरोंक्रसी बन गई थी।

इस काउंसिल में शामिल सदस्यों को लैटरल एंट्री के जरिए ही शामिल किया गया था। यूपीए सरकार के दौरान राष्ट्रीय सलाहकार परिषद को लेकर अक्सर सवाल उठते थे। ऐसे में आइए जानते हैं कि यह राष्ट्रीय सलाहकार परिषद क्या थी और यह कैसे काम करती थी?

पर्दे के पीछे से सरकार चलाने के लगते थे आरोप

2004 में यूपीए सरकार के गठन के तुरंत बाद 4 जून 2004 को राष्ट्रीय सलाहकार परिषद का गठन किया गया था। इसकी अध्यक्ष स्वयं सोनिया गांधी थीं और इसके कारण आरोप लगे कि वह पर्दे के पीछे से सरकार चला रही थीं। जबकि यूपीए सरकार का कहना था कि सलाहकार परिषद का उद्देश्य कल्याणकारी योजनाओं के लिए सलाह देना है। इस परिषद का कार्यकाल मई 2014 तक चला, जब तक मनमोहन सिंह सरकार सत्ता में रही। इस सलाहकार परिषद में सोनिया गांधी के अलावा कई सामाजिक कार्यकर्ता, अर्थशास्त्री, नौकरशाह, राजनेता और उद्योगपति शामिल थे।

किन लोगों को मिली थी सोनिया की NAC में जगह

इनमें से ज्यादातर लोग लेटरल एंट्री के जरिए ही आए थे। सलाहकार परिषद की अध्यक्ष के रूप में सोनिया गांधी को कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिला। इस काउंसिल में मिहिर शाह, नरेंद्र जाधव, आशीष मंडल, प्रोफेसर प्रमोद टंडन, दीप जोशी, फराह नकवी, प्रोफेसर एमएस स्वामीनाथन, ज्या ड्रेज, हर्ष मंदर, माधव गाडगिल, अरुणा रॉय जैसे लोग शामिल थे। इनमें से कई लोग ऐसे थे जिनके नाम पर कई बार विवाद हुआ।

NACने कई कानूनों को तैयार करने में किया था हस्तक्षेप

इस सलाहकार परिषद की इसलिए भी आलोचना की गई क्योंकि कहा गया कि यह यूपीए सरकार का एजेंडा तय करती है। इसके जरिए ही मनरेगा, खाद्य सुरक्षा बिल, शिक्षा का अधिकार और सूचना का अधिकार जैसे कानूनों के सुझाव दिए गए। आलोचकों का कहना था कि यह परिषद एक समानांतर कैबिनेट की तरह है, जो संविधान के ख़िलाफ़ है। इसके अलावा बिलों को कैबिनेट की बजाय परिषद द्वारा तैयार करना भी विरोध का कारण बना और कहा गया कि इससे संविधान की गरिमा का उल्लंघन होता है।

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