
Haryana Assembly Elections: हरियाणा का विधानसभा चुनाव इस बार बेहद दिलचस्प नजर आ रहा है। इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने मिलकर चुनावी मैदान में उतरने का फैसला किया है, जबकि चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी ने दुष्यंत चौटाला की जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) के साथ गठबंधन कर लिया है।
गठबंधन की रणनीति
चंद्रशेखर आजाद, जो नगीना सीट से सांसद हैं, उन्होंने 90 विधानसभा सीटों वाले हरियाणा में 20 सीटों पर जेजेपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की घोषणा की है। जेजेपी 70 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। इस गठबंधन की सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि क्या ये दल मिलकर 21 प्रतिशत दलित वोट बैंक को प्रभावी ढंग से एकत्रित कर पाएंगे या यह गठबंधन वोटों का बिखराव पैदा करेगा।
राजनीतिक विश्लेषण
हेमंत अत्री, एक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक, का कहना है कि इन दोनों गठबंधनों को चुनावी सफलता मिलने की संभावना बहुत कम है। अत्री के अनुसार, “इनेलो और जेजेपी ने अपना जनाधार खो दिया है। लोकसभा चुनाव के नतीजे इसका स्पष्ट प्रमाण हैं। जेजेपी और इनेलो का वोट प्रतिशत बेहद कम है, और बसपा का भी हरियाणा में कोई खास आधार नहीं है। चंद्रशेखर आजाद का पहले भी कोई मजबूत आधार नहीं था और इस बार भी उनकी स्थिति वैसी ही दिखाई देती है।”
दलित वोट बैंक का प्रभाव
अत्री का यह भी कहना है कि जब इनेलो और जेजेपी का जाट वोट बैंक इन्हें छोड़ चुका है, तो दलित वोटर इन पार्टियों के साथ क्यों आएंगे? उनका मानना है कि मतदाता अपनी वोट को व्यर्थ नहीं करना चाहते और हारने वाले को वोट देना स्वीकार नहीं करते। अत्री ने सवाल उठाया “यदि जाट वोटर इन पार्टियों से दूर हो चुके हैं, तो दलित वोटर क्यों साथ आएंगे?”
चंद्रशेखर आजाद का क्षेत्रीय प्रभाव
चंद्रशेखर आजाद के हरियाणा चुनाव में संभावित प्रभाव के बारे में अत्री का कहना है कि वे यूपी में कुछ आधार रखते हैं, लेकिन हरियाणा में उनकी उपस्थिति नगण्य है। अत्री ने कहा, “आजाद को यूपी में थोड़ा बहुत जनाधार हो सकता है, लेकिन हरियाणा में उनका कोई खास प्रभाव नहीं दिखता। राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, और अखिलेश यादव भी एक समय उनके साथ थे, लेकिन इसका कोई महत्वपूर्ण परिणाम नहीं आया।”
जेजेपी और इनेलो की वर्तमान स्थिति
हेमंत अत्री ने निष्कर्ष निकाला कि जेजेपी और इनेलो दोनों ही राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। अत्री ने कहा, “जेजेपी इस चुनाव में एक भी सीट नहीं जीत पाएगी, जबकि इनेलो शायद एक सीट जीत सके। हरियाणा की जनता किसी भी प्रकार के विश्वासघात को बर्दाश्त नहीं करती। जेजेपी और बीजेपी के गठबंधन के चलते जनता में नाराजगी साफ देखी जा सकती है, जो इस बार भी स्पष्ट होगी।”
इन विश्लेषणों के आधार पर, हरियाणा विधानसभा चुनाव के परिदृश्य में कई दिलचस्प और महत्वपूर्ण बदलाओं को देखना होगा। यह चुनावी गठबंधन कितना सफल होता है, यह देखने वाली बात होगी।
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