Gurugram Rain Traffic Jam: देश के सबसे तेजी से विकसित होते शहरों में शामिल गुरुग्राम की चमक बारिश आते ही फीकी पड़ जाती है। एक तरफ ऊंची-ऊंची इमारतें, बड़ी-बड़ी कंपनियों के दफ्तर और करोड़ों रुपये की लग्जरी सोसायटी हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ घंटों की बारिश के बाद सड़कों पर पानी भर जाता है, लंबा जाम लग जाता है और लोग घंटों तक परेशान होते हैं। मिलेनियम सिटी गुरुग्राम में एक बार फिर बारिश ने नगर निगम और प्रशासन के ड्रेनेज सिस्टम की कमजोरियों को उजागर कर दिया है। गोल्फ कोर्स रोड, गोल्फ कोर्स एक्सटेंशन रोड और द्वारका एक्सप्रेसवे जैसे महंगे इलाकों में रहने वाले लोग भी जलभराव की समस्या से जूझते नजर आए।
इन इलाकों में लोग करोड़ों रुपये खर्च कर घर खरीदते हैं, लेकिन बारिश के बाद इन सोसायटियों के बाहर की सड़कें तालाब में बदल जाती हैं। कई जगह गाड़ियां पानी में फंस गईं और लोगों को घंटों ट्रैफिक जाम का सामना करना पड़ा। सिर्फ कुछ किलोमीटर का सफर तय करने में लोगों को 3 से 4 घंटे तक लग गए।
लोगों का गुस्सा देखने को मिला
जलभराव के बाद सोशल मीडिया पर भी लोगों का गुस्सा देखने को मिला। कई लोगों ने पानी से भरी सड़कों के वीडियो शेयर किए और प्रशासन की व्यवस्था पर सवाल उठाए। लोगों का कहना है कि भारी टैक्स देने के बावजूद उन्हें हर साल बारिश में ऐसी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, गुरुग्राम में तेजी से हुए निर्माण और बढ़ते कंक्रीट के जंगल ने समस्या को और गंभीर बना दिया है। शहर के पुराने प्राकृतिक जल निकासी रास्तों, नालों और तालाबों पर निर्माण होने से बारिश का पानी निकल नहीं पाता।
पानी की निकासी के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं
अर्बन प्लानर और आर्किटेक्ट डॉ. सुप्तेंदु पी. बिश्वास ने कहा कि गुरुग्राम में विकास पहले हुआ और शहरी योजना बाद में बनाई गई। बिल्डरों ने ऊंची इमारतें तो बना दीं, लेकिन सीवेज और बारिश के पानी की निकासी के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं की गई। उन्होंने बताया कि कुछ दशक पहले तक गुरुग्राम में ऐसी जलभराव की समस्या नहीं थी। अरावली से आने वाला बारिश का पानी प्राकृतिक नालों, तालाबों और जोहड़ों के जरिए आसानी से निकल जाता था। लेकिन अनियोजित निर्माण के कारण ये प्राकृतिक रास्ते खत्म हो गए। गुरुग्राम में हर साल नए एक्सप्रेसवे और इमारतें बन रही हैं, लेकिन अगर ड्रेनेज सिस्टम का स्थायी और वैज्ञानिक समाधान नहीं निकाला गया तो ‘साइबर सिटी’ का यह संकट हर मानसून में दोहराता रहेगा।