इन कथाओं के जुड़ा है दिवाली का पावन त्योहार, जानें इस पर्व की महत्वता और धारणाएं

इन कथाओं के जुड़ा है दिवाली का पावन त्योहार, जानें इस पर्व की महत्वता और धारणाएं

नई दिल्ली: रोशनी का पर्व दीपावली सनातन धर्म का प्राचीन पर्व है। इस पर्व के साथ अनेक धार्मिक, पौराणिक एवं ऐतिहासिक मान्यताएं जुड़ी हुई है। यह पर्व श्रीराम के लंकापति रावण पर विजय हासिल करके और चौदह वर्ष का वनवास पूरा करके अयोध्या लौटने की खुशी में मनाया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार जब मर्यादा पुरुषोत्‍तम श्रीराम देवी सीता और अनुज लक्ष्मण सहित अयोध्‍या वापस लौटे तो नगरवासियों ने घर-घर दीप जलाकर खुशियां मनाईं थीं। इसी पौराणिक मान्यतानुसार प्रतिवर्ष घर-घर घी के दीये जलाए जाते हैं और खुशियां मनाई जाती हैं।

कठोपनिषद में मिलता है ये प्रसंग

बता दें कि कठोपनिषद में यम-नचिकेता का प्रसंग आता है। इसके अनुसार नचिकेता जन्म-मरण का रहस्य यमराज से जानने के बाद यमलोक से वापिस मृत्युलोक में लौटे थे। एक धारणा के मुताबिक नचिकेता के मृत्यु पर अमरता के विजय का ज्ञान लेकर लौटने की खुशी में भू-लोकवासियों ने घी के दीप जलाए थे। किवदंती है कि यही आर्यवर्त की पहली दीपावली थी।

लक्ष्मी जी से जुड़ी कथा

दरअसल, एक अन्य कथा के अनुसार इसी दिन लक्ष्मी जी का समुद्र मंथन से आविर्भाव हुआ था। इस प्रसंग के मुताबिक ऋषि दुर्वासा द्वारा देवराज इंद्र को दिए गए शाप के कारण लक्ष्मीजी को समुद्र में जाकर समाना पड़ा था। इस परिस्थिति का फायदा उठाते हुए असुर उनके ऊपर हावी हो गए। देवगणों की याचना पर भगवान विष्णु ने योजनाबध्द ढ़ंग से सुरों व असुरों के हाथों समुद्र-मंथन करवाया। समुद्र-मंथन से अमृत सहित चौदह रत्नों में श्री लक्ष्मी भी निकलीं, जिसे श्री विष्णु ने ग्रहण किया। लक्ष्मीजी के पुनार्विभाव से देवगणों में बल व श्री का संचार हुआ और उन्होंने पुन: असुरों पर विजय प्राप्त की। लक्ष्मीजी के इसी पुनार्विभाव की खुशी में समस्त लोकों में दीप प्रज्जवलित करके खुशियां मनाईं गई। इसी मान्यतानुसार प्रतिवर्ष दीपावली को लक्ष्मीजी की पूजा-अर्चना की जाती है। मार्कंडेय पुराण के अनुसार समृद्धि की देवी श्री लक्ष्मी जी की पूजा सर्वप्रथम नारायण ने स्वर्ग में की। इसके बाद लक्ष्मीजी की पूजा दूसरी बार, ब्रह्माजी ने, तीसरी बार शिवजी ने, चौथी बार समुद्र-मंथन के समय विष्णुजी ने पांचवी बार मनु ने और छठी बार नागों ने की थी।

भगवान श्री कृष्ण से जुड़ी कथा

इसके अलावा दीपावली पर्व के बारे में एक प्रसंग कन्हैयाजी से भी जुड़ी हुआ है। वहीं इस कथा के अनुसार भगवान बाल्यावस्था में पहली बार गाय चराने के लिए वन में गए थे। संयोगवश इसी दिन श्रीकृष्ण ने इस मृत्युलोक से प्रस्थान किया था। एक अन्य कथा के अनुसार इसी दिन श्रीकृष्ण ने नरकासुर नामक नीच असुर का वध करके उसके द्वारा बंदी बनाई गई देव, मानव और गंधर्वों की सोलह हजार कन्याओं को मुक्ति दिलाई थी। इसी खुशी में लोगों ने दीप जलाए थे। बाद में यह एक परंपरा के रूप में परिवर्तित हो गई।

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