
Harayana Elections 2024: हरियाणा विधानसभा चुनावों से पहले सियासी माहौल गरमा गया है। बीजेपी सत्ता की हैट्रिक लगाने की कोशिश में है, वहीं कांग्रेस दस साल बाद सत्ता में वापसी की बेताबी दिखा रही है। इनेलो और जेजेपी जैसे दल भी अपने सियासी अस्तित्व को बचाए रखने की जंग लड़ रहे हैं। इस सियासी खेल में दलित वोटों की अहमियत को लेकर सभी दलों की नजरें टिकी हैं। जाट समाज के बाद राज्य में दलित दूसरा सबसे बड़ा समुदाय है, जिसकी राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका है।
कांग्रेस की रणनीति: दलित और जाट वोटों की जोड़तोड़
कांग्रेस हरियाणा में सत्ता की वापसी के लिए जाट और दलित वोटों पर पूरी तरह निर्भर है। जाट करीब 30 फीसदी और दलित 21 फीसदी हैं, जिससे कांग्रेस 50 फीसदी वोटबैंक को अपनी ओर लाने का लक्ष्य बना रही है। बीजेपी की गैर-जाट राजनीति के जवाब में कांग्रेस ने जाट और दलित का समीकरण बनाना शुरू किया। भूपेंद्र सिंह हुड्डा को पार्टी का नेतृत्व सौंपा गया है, जबकि दलित नेता चौधरी उदयभान को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है। कुमारी शैलजा भी कांग्रेस की दलित चेहरा हैं। 2019 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने दलित-जाट समीकरण से बीजेपी को कड़ी टक्कर दी थी और 2024 लोकसभा चुनाव में भी दलित मतदाताओं का रुझान कांग्रेस के पक्ष में था।
बीजेपी की दलित वोटों पर फोकस
बीजेपी ने दलित वोट बैंक के खिसकने के कारण 2019 के लोकसभा चुनाव में नुकसान उठाया था। अंबाला और सिरसा जैसी रिजर्व सीटों पर हार के बाद, बीजेपी ने दलित वोटर्स को साधने के लिए एक विशेष अभियान शुरू किया है। पार्टी ने दलित बहुल सीटों पर सम्मेलन आयोजित कर केंद्र और राज्य की योजनाओं की जानकारी दी और उनकी समस्याओं का समाधान करने का आश्वासन दिया। बीजेपी ने दलित समुदाय को जोड़ने के लिए 'मनोहर लाल का परिवार' नामक विशेष कार्यक्रम भी शुरू किया है।
इनेलो और बसपा का गठबंधन
इनेलो के नेता अभय चौटाला ने दलित वोटों को साधने के लिए बसपा के साथ गठबंधन किया है। इनेलो और बसपा दोनों दलों ने दलित आधार वाले मतदाताओं को अपने पक्ष में लाने के लिए गठबंधन किया है। 90 में से 53 सीटों पर इनेलो और 37 सीटों पर बसपा चुनाव लड़ेगी। पिछले चुनावों में इनेलो और बसपा के प्रदर्शन को देखते हुए यह देखना होगा कि इस गठबंधन से दलित वोटों में कितना फायदा होता है।
जेजेपी का दलित पार्टी के साथ गठबंधन
जेजेपी ने भी दलित वोटों को साधने के लिए चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी के साथ गठबंधन किया है। हरियाणा की 90 में से 70 सीटों पर जेजेपी और 20 सीटों पर आजाद समाज पार्टी चुनाव लड़ेगी। जेजेपी ने 87 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 10 सीटों पर जीत हासिल की थी, जबकि बाकी पर उसकी जमानत जब्त हो गई थी। अब दुष्यंत चौटाला की पार्टी दलित वोटों को अपने पक्ष में लाने के लिए चंद्रशेखर आजाद के साथ गठबंधन कर रही है।
दलित समुदाय की राजनीतिक ताकत
हरियाणा में दलित समुदाय 21 फीसदी के आसपास है और 17 विधानसभा सीटें अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित हैं। दलित वोटर राज्य की 35 सीटों पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। रविदास, बाल्मीकी और अन्य दलित समुदायों की प्रभावशीलता हरियाणा की सियासत में महत्वपूर्ण है। डेरा सच्चा सौदा का भी दलित वोटों पर प्रभाव है, विशेषकर जब उसके प्रमुख गुरमीत सिंह राम रहीम जेल में हैं। इस प्रकार, सभी दलों की निगाहें दलित वोटों पर लगी हुई हैं, जो चुनावी परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं।
Leave a comment