
नई दिल्ली: देश में हजारों मंदिर है, कुछ छोटे-कुछ बड़े। सब मंदिरों की अपनी मानताएं है। सब मंदिरों में पूजा करने की भी अलग-अलग विधि है। सब मंदिरो में अलग-अलग भगवान की प्रतिमा अलग-अलग रुप में स्थापित हैं। लेकिन अपने कभी ऐसे मंदिर के बारे में सुना है जहां कुत्ते को पूजा हो, लोग वहां दूर-दूर से आकर पूजा करते हो, मन्नत मांगते हो। आज हम अपको ऐसे ही एक मंदिर के बारे में बताने जा रहे है, जहां ऐसा सच में होता है।
छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के खपरी में स्थित कुकुरदेव मंदिर। यहां एक स्वामीभक्त कुत्ते की याद में समाधि और मंदिर बनाया गया है। इस मंदिर में कुत्ते की प्रतिमा शिवलिंग के साथ गृभग्रह में स्थापित है। लोग शिव जी के साथ-साथ कुत्ते (कुकुरदेव) की भी वैसे ही पूजा करते हैं जैसे शिवमंदिरों में नंदी की पूजा होती है। कहा जाता है कि इस कुत्ते ने अपनी अंतिम सांस तक अपने मालिक के प्रति वफादारी निभाई। लोगों के बीच इस मंदिर की बहुत मानता है। इस मंदिर पर जाकर श्रद्धालु अपनी सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना करते हैं। छत्तीसगढ़ में एक बेजुबान जानवर को उसकी वफादारी के लिए देवता का दर्जा मिला है। मान्यता है कि कुकुरदेव का दर्शन करने से न कुकुरखांसी होने का डर रहता है और न ही कुत्ते के काटने का खतरा रहता है। यह मंदिर 200मीटर के दायरे में फैला हुआ है। मंदिर के गर्भगृह के अलावा यहां के प्रवेश द्वार पर भी दोनों ओर कुत्तों की प्रतिमा लगाई गई है।
मंदिर के पीछे का इतिहास
कहते हैं कि सदियों पहले एक बंजारा अपने परिवार के साथ इस गांव में आया था। उसके साथ एक कुत्ता भी था। गांव में एक बार अकाल पड़ गया तो बंजारे ने गांव के साहूकार से कर्ज लिया, लेकिन वो कर्ज वो वापस नहीं कर पाया। ऐसे में उसने अपना वफादार कुत्ता साहूकार के पास गिरवी रख दिया। कुछ समय बीत जाने के बाद एक दिन साहूकार के यहां चोरी हो गई। चोरों ने सारा माल जमीन के नीचे गाड़ दिया और सोचा कि बाद में उसे निकाल लेंगे, लेकिन कुत्ते को उस लूटे हुए माल के बारे में पता चल गया और वो साहूकार को वहां तक ले गया। कुत्ते की बताई जगह पर साहूकार ने गड्ढा खोदा तो उसे अपना सारा माल मिल गया।
कुत्ते की वफादारी से खुश होकर साहूकार ने उसे आजाद कर देने का फैसला लिया। इसके लिए उसने बंजारे के नाम एक चिट्ठी लिखी और कुत्ते के गले में लटकाकार उसे उसके मालिक के पास भेज दिया। इधर कुत्ता जैसे ही बंजारे के पास पहुंचा, उसे लगा कि वो साहूकार के पास से भागकर आया है। इसलिए उसने गुस्से में आकर कुत्ते को पीट-पीटकर मार डाला। हालांकि बाद में बंजारे ने कुत्ते के गले में लटकी साहूकार की चिट्ठी पढ़ी तो वो हैरान हो गया। उसे अपने किए पर बहुत पछतावा हुआ। उसके बाद उसने उसी जगह कुत्ते को दफना दिया और उस पर स्मारक बनवा दिया। स्मारक को बाद में लोगों ने मंदिर का रूप दे दिया, जिसे आज लोग कुकुर मंदिर के नाम से जानते हैं।
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