Reservation:जातिगत आरक्षण के विरोध में दिल्ली के जंतर-मंतर पर 21 अगस्त को प्रदर्शन किया गया। प्रदर्शनकारी मौजूदा आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा की मांग कर रहे हैं। साथ ही आर्थिक आधार पर सरकारी सहायता देने की बात कर रहे हैं। दूसरी सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि आरक्षण खत्म करने की कोशिश हो रही है।
भारत में आरक्षण ऐसा विषय है जिस पर लगातार बयानबाजी होती रही है। अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या आजादी के इतने वर्षों बाद आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए या खत्म करना चाहिए? जब भी यह मामला कोर्ट में पहुंचता है, तो अदालत का रुख बिल्कुल साफ होता है। सुप्रीम कोर्ट कई बार साफ कर चुका है कि आरक्षण को खत्म करना न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है।
आरक्षण को लेकर संविधान में क्या है प्रावधान
भारत के संविधान के अनुच्छेद 15(4) और 16(4) के अनुसार, राज्य के पास यह अधिकार है कि यदि सरकारी नौकरियों या शिक्षण संस्थानों में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (SC/ST/OBC) का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है, तो उनके लिए पद आरक्षित किए जा सकते हैं।
अनुच्छेद 330 और 332 (भाग XVI), ये अनुच्छेद लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए उनकी जनसंख्या के मुताबिक सीटों के आरक्षण की गारंटी देते हैं।
वहीं, अनुच्छेद 335 के अनुसार SC/ST के दावों पर विचार करते समय प्रशासन की दक्षता को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा
आरक्षण का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में भी कई बार पहुंचा है। इस बहस का सबसे पुख्ता और आधिकारिक जवाब सुप्रीम कोर्ट के 28 जनवरी 2022 को दिया है। यह निर्णय जरनैल सिंह बनाम लक्ष्मी नारायण गुप्ता मामले में आया था। इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की बेंच कर रही थी, जिसमें न्यायमूर्ति एल. नागेश्वर राव, न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति बी.आर. गवई शामिल थे। इस फैसले में पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा यह न्यायालय पूर्ण रूप से आरक्षण को समाप्त करने नहीं कर सकता, क्योंकि यह पूरी तरह से विधायिका और कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र का विषय है।
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