भारत के लिए खतरे की घंटी!

भारत के लिए खतरे की घंटी!

नई दिल्ली(लेखक-कुमारआकाश): भूटान के पीएम लाते शेयरिंग का बयान भारत के लिए चिंता बनकर आया है। उन्होंने कहा कि डोकलाम की जो स्थिति है उसको सुलझाने के लिए चीन बराबर का भागीदार है। ऐसा लगता है कि चीन को एक हिस्सा बना दिया है। ये बयान भारत के लिए सही नहीं है।

भारत नहीं चाहता कि डोकलाम मामले पर चीन की कोई भी भागीदारी हो। अगर चीन को डोकलाम मिलता है तो इससे सिलीगुड़ी कोरिडोर को खतरा होगा। ये वो चिकन नेट क्षेत्र है जहां से बाकि भारत पूर्वोत्तर राज्यों से जुड़ता है। अगर चीन माउंट गिप्मोची तक पहुंचता है तो फिर चिकन नेक को सीधा देख सकता है। 2017से ही चीन लगातार डोकलाम पर दबाव बनाए हुए है। चीन भूटान की सीम पर डोकलाम पठार के साथ कई गांव बसा चुका है। आमूचू नदी के किनारे चीन एक गांव बसा चुका है। 2017में जहां भारत और चीन की सीमा आमने सामने आई है वहां से ये जगह महज 10किलोमीटर दूर है।

खास बिंदू ट्राई जंक्शन को चीन दक्षिण की तरफ माउंट गिपमोची की तरफ लाना चाहता है। यदि ऐसा होता है तो पूरा डोकलाम पठार चीन के कब्जे में आ जाएगा। भारत के साथ भूटान के सहयोग की बड़ा आवश्यकता है क्योंकि चिकन नेक और भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को सुरक्षा मिलती है। भूटान नेपूर्व के हिस्से में भारत विरोधी गतिविधियों को रोकने में अहम भूमिका निभाई थी। भूटान में राजनैतिक स्थिरता की जरूरत है। यहां जरूरत है कि कूटनीतिक स्तर पर हुई चूक को समझने की। भारत को सही सूझबूझ के साथ भूटान को अपने साथ लाना होगा क्योंकि चीन शुरू से ही विस्तारवादी नीति पर चला है। वो ये जानता है कि भूटान यदि उसके साथ आ गया तो भारत की चिकन नेट पर आसानी से नजर रखी जा सकेगी और भविष्य में ये भारत के लिए खतरे की बड़ी साबित होगा।

भूटान के प्रधानमंत्री को समझना होगा कि भूटान का भारत ने सदैव हित सोचा है। एक समझौते के तहत भारत की सेना भूटान की सीमाओं की रक्षा करती है। भूटान के सिविल सेवा अधिकारियों का प्रशिक्षण भी एक करार के तहत भारत में होता रहा है। इस साल भी भूटान सिविल सेवा के पांच अधिकारियों को बेंगलुरू में इंडियन रेवेन्यू सर्विस के साथ प्रारंभिक प्रशिक्षण दिया गया। उन अधिकारियों ने कहा था कि उन्हें भारत में आकर अपने ज्ञान को बढ़ाने का मौका मिला। उन्हें भूटान के विपरीत भूमि, समुद्र और वायु व्यापार के बारे में सीखने को मिला, जो ज्यादातर पहाड़ों के बारे में है।

पीएम लोटे शेरिंग को अपने स्तर पर भारत से बात करनी चाहिए थी और किसी भी प्रकार के वैचारिक मतभेद को सुलझाने का प्रयास करना चाहिए था। किंतु अब ये बात अखबारों के जरिए हो रही है जोकि भारत के लिए किसी भी मायने में सही नहीं है। यदि आने वाले वक्त में भारत का चीन के साथ गतिरोध बढ़ता है तो भूटान का भारत के साथ होना बेहद जरूरी है।

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