Awarapan 2 Review: 2007 में रिलीज हुई फिल्म ‘आवारापन’ धीरे-धीरे दर्शकों के बीच एक खास पहचान बनाने वाली फिल्म बन गई थी। फिल्म के मुख्य किरदार शिवम को इमरान हाशमी ने निभाया था। अकेलापन, प्यार और कुर्बानी से भरे इस किरदार ने दर्शकों के दिल में खास जगह बनाई। फिल्म के अंत में शिवम का बलिदान उसकी कहानी को एक अलग ऊंचाई देता है। अब इसके सीक्वल ‘आवारापन 2’ में वही किरदार वापस आया है, लेकिन इस बार कहानी पहले हिस्से की भावनात्मक गहराई को पूरी तरह बरकरार नहीं रख पाती।
क्या है फिल्म की कहानी?
पहली फिल्म के अंत में शिवम दो प्रेमियों को मिलाने के बाद अपनी जान कुर्बान कर देता है। उसका बलिदान उसके पुराने गुनाहों का प्रायश्चित भी माना गया था। लेकिन सीक्वल में बताया गया है कि शिवम की मौत नहीं हुई थी। कई साल बाद वह भारत के एक गांव में गुमनाम और शांत जिंदगी जी रहा है। वह आज भी आलिया की याद में उसकी कब्र पर जाता है और अपने जीवन के मायने तलाशता है।
दिशा पाटनी फिल्म में लाती हैं ताजगी
फिल्म में शिवम को बच्चों को मानव तस्करी के गिरोह से बचाने की जिम्मेदारी मिलती है। बैंकॉक में चल रहे अपराध के नेटवर्क को तोड़ने के लिए इंटरपोल भी उसकी मदद लेता है। इस गिरोह से जुड़े किरदारों में नफीसा और खतरनाक जोरावर शामिल हैं। इसी कहानी में जोरावर की बहन जारा का किरदार भी सामने आता है, जिसे दिशा पाटनी ने निभाया है। उनका किरदार फिल्म में कुछ ताजगी लेकर आता है।
फिल्म में क्या रह गई कमी?
फिल्म के एक्शन सीक्वेंस पहले से काफी बेहतर नजर आते हैं। कैमरा वर्क और लाइटिंग भी कई जगह प्रभावशाली है। लेकिन समस्या यह है कि फिल्म शिवम के भावनात्मक सफर पर उतना ध्यान नहीं देती। वह एक इंसान से ज्यादा एक पुराने किरदार की छवि बनकर रह जाता है। फिल्म के संगीत में ‘तेरा मेरा रिश्ता पुराना’ अब भी भावनाओं को छूता है। इमरान हाशमी की स्क्रीन मौजूदगी भी मजबूत है। उनका चेहरा आज भी शिवम के दर्द को उसी तरह व्यक्त करता है। हालांकि, कमजोर स्क्रीनप्ले उनकी क्षमता को पूरी तरह इस्तेमाल नहीं कर पाता।
एक्शन से भरी है फिल्म
शबाना आजमी का किरदार भी अपेक्षित असर नहीं छोड़ता। उनके किरदार को जिस तरह पेश किया गया है, वह कई जगह असहज लगता है। वहीं इमरान हाशमी के लिए भी फिल्म में ज्यादा भावनात्मक गहराई की गुंजाइश थी। कुल मिलाकर ‘आवारापन 2’ में बेहतर एक्शन, शानदार विजुअल्स और इमरान हाशमी की दमदार मौजूदगी है, लेकिन पहली फिल्म की आत्मा और भावनात्मक असर कम नजर आता है। फिल्म शिवम को वापस तो ले आती है, लेकिन उसके भीतर के उस दर्द और बदलाव को पूरी तरह सामने नहीं ला पाती, जिसने पहली ‘आवारापन’ को यादगार बनाया था।
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