
AJAB-GAJAB: भारत में कई धर्म-जाति के लोग रहते है और उनके तीज-त्योहार काफी सभी के अलग-अलग होते है। ऐसे में भारत की पूजा की काफी चर्चा में हो रही है। जिससे भूत-पूजा के नाम से जाना जाता है। दरअसल भारत में कुछ गांवों में भूत-पूजा की परंपरा है। उन्हीं में से एक गांव है बेगुंग गांव (Begunkodor) जो भारत के पश्चिम बंगाल राज्य में स्थित है। यह गांव संयुक्त राज्य अमेरिका के मिशिगन राज्य के जंगलों से लगभग 150मील दूर है।
भूत-पूजा के दौरान लोग मृतकों की आत्माओं की पूजा करते हैं और उन्हें खुश करने की कोशिश करते हैं। इस परंपरा के अनुसार, अगर कोई व्यक्ति मरता है तो उसकी आत्मा उसके शरीर से निकलती है। इसलिए, इस परंपरा के तहत लोग उन मृतकों की आत्माओं को खुश रखने के लिए उन्हें भोजन और दान करते हैं।
भूत-पूजा के दौरान गांव के लोग बहुत सारे रंग-बिरंगे परिधान पहनते हैं और नृत्य और गीत गाते हैं। यह उत्सव मुख्य रूप से मार्च या अप्रैल महीने में मनाया जाता है।
भूत-पूजा क्यों की जाती है
भारत में भूत-पूजा की परंपरा काफी पुरानी है और इसके पीछे कई मान्यताएं हैं। इस परंपरा के अनुसार, जब कोई व्यक्ति मरता है तो उसकी आत्मा शरीर से निकलती है। इसलिए, लोग मृतकों की आत्माओं को खुश रखने के लिए भूत-पूजा करते हैं। इस परंपरा में, लोग मृतकों को पूजते हैं और उन्हें भोजन देते हैं, जिससे उनकी आत्माओं को खुश महसूस होता है और वे संतुष्ट रहते हैं।
इसके अलावा, कुछ लोग इस विश्वास के साथ भूत-पूजा करते हैं कि मृतकों की आत्माएं अगली जन्म में इन लोगों के घर में जन्म ले सकती हैं और उन्हें खुश रखना अनिवार्य होता है।यह परंपरा भारत के कुछ राज्यों में विशेष रूप से प्रचलित है, जैसे पश्चिम बंगाल, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और चत्तीसगढ़ आदि।
हर साल गांव के लोग अपने हाथों से ‘मूर्ति’ बनाते हैं
यह एक दिलचस्प विवरण है! कृपया ध्यान दें कि भारत में ऐसी भिन्न परंपराएं होती हैं, जो एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में भिन्न हो सकती हैं। कुछ गांवों में, भूत-पूजा के अवसर पर, स्थानीय लोग अपने हाथों से मूर्तियां बनाते हैं। इस परंपरा में, एक लोहे का फ़्रेम तैयार किया जाता है, और फिर उसे घास या पाया से भर दिया जाता है। इसके बाद, मूर्ति की सतह को मिटटी से ढका जाता है ताकि उसे समतल और इच्छित आकार मिल सके। फिर, मूर्ति की चेहरे और उसकी अन्य विशेषताओं को आकार दिया जाता है। अंत में, मूर्ति को रंगा जाता है।
यह परंपरा विभिन्न तरीकों से पूरे देश में मनाई जाती है। इसके अलावा, आधुनिकता के दौर में, लोग अब मूर्तियों को तैयार करने के लिए प्लास्टिक या फाइबर का उपयोग भी करते हैं।
इस पूजा की शुरुआत पांचवीं सदी में यादव सन्यासी ने की
भूत-पूजा के शुरूआत के बारे में विभिन्न कथाओं और लोक कथाओं में विभिन्न विवरण होते हैं। यह एक लोक परंपरा है जो भारत के विभिन्न हिस्सों में मनाई जाती है और इसका मूल उद्देश्य अज्ञात अनुभूतियों से लोगों को बचाना था।
एक कथा के अनुसार, भूत-पूजा के शुरूआत पांचवीं सदी में एक यादव सन्यासी ने की थी। इस सन्यासी ने भूत-पूजा की शुरूआत इसलिए की थी क्योंकि उन्होंने अनुभव किया था कि अज्ञात शक्तियों या भूतों से लोगों को बचाने का सबसे सरल तरीका उनकी पूजा और आराधना हो सकती है। उनकी इस बात को सुनकर उनके अनुयायी भूतों की पूजा शुरू कर दी और यह परंपरा तब से चलती आ रही है।
इसके अलावा, कुछ लोग इस बात को मानते हैं कि भूत-पूजा का मूल उद्देश्य उन अमूल्य ज्ञानों को संरक्षित रखना है जो पूर्वजों द्वारा प्राप्त किए गए थे और उन्होंने उन्हें अज्ञात शक्तियों से संरक्षित रखा था। हर साल गांव के लोग अपने हाथों से ‘मूर्ति’ बनाते हैं। इस मूर्ति का सिर और गर्दन नहीं होता पर शरीर के निचले हिस्से में आंख, नाक, मुंह आदि होते हैं। मूर्ति को ज़मीन पर स्थापित कर इसकी पूजा करते हैं। पूजा वर्ष के शुरुआत में की जाती है।
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