
नई दिल्ली: मगरमच्छ और घड़ियाल के आंसू। ये कहावत अक्सर आप लोगों ने अपने दोस्तों और परिवारों के मुंह से जरूर सुनी होगी। इस कहावत का मतलब भी कई लोगों को पता होता है तो कई लोगों को नहीं। क्या है इस कहावत का मतलब। इस कहावत को ही क्यों याद किया जाता है? क्या है इस कहावत पर वैज्ञानिकों का कहना? आज हम आपको इन सभी सवाले के जवाब देंगे।
दरअसल जब किसी व्यक्ति को लगता है कि सामने वाला व्यक्ति झूठ-मूठ का रो रहा है तो लोगों के मुंह से यही कहावत निकलती है। कि ये मगरमच्छ या घड़ियाल आंसू ना निकालो। ये इसलिए कहा जाता है कि मगरमच्छ और घड़ियाल के हमेशा आंसू झूठे होते है और इस बात का पता चला एक रिसर्च से। बता दें कि 2006 में अमेरिकन वैज्ञानिकों ने घड़ियालों पर रिसर्च की गई थी। जिसका नतीजे में कहा गया कि जब घड़ियाल को पानी से दूर किसी सूखी जगह पर खाना दिया गया तो उनकी आंखों से आंसू आने लगे। वहीं मगरमच्छ खाना खाते समय आंसू बहाते हैं और इसका लेना देना किसी भी भावना से नहीं है। इसीलिए ऐसा कहा जाता है कि घड़ियाली आंसू मत बहाओ या मगरमच्छ के आंसू नहीं रोना चाहिए।
क्यों कही जाती है ये कहावत
बता दें कि जब कोई इंसान झूठ-मूठ का रोता है उसमें कोई भावना नहीं होती है। यानी वो बिना भावना के रोता है। ऐसे ही मगरमच्छ या फिर घड़ियाल में भावनाएंनहीं होती हैं। वो दोनों जानवर भी बिना भावना के रोतो है। शायद इसलिए जब इंसान रोता है तो उनकी तुलना इन दो जानवरों से की जाती है।
दोनों मे फर्क
बता दें कि मगरमच्छ हो या फिर घड़ियाल दोनों जानवर ही खाना खाते समय आंसू बहाते हैं। घड़ियाल का मुंह यू शेप का होता है तो मगरमच्छ का चेहरा वी शेप का होता है। घड़ियाल का जबड़ा भी मगरमच्छ के मुकाबले चौड़ा होता है। मगरमच्छ के आंसू मक्खियां पी जाती हैं।
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