क्यों मनाया जाता रहा है राष्ट्रीय वन शहीद दिवस, जानें इसका इतिहास

क्यों मनाया जाता रहा है राष्ट्रीय वन शहीद दिवस, जानें इसका इतिहास

नई दिल्ली:आज पूरे देशभर में राष्ट्रीय वन शहीद दिवस मनाया जा रहा है। भारत में वन्यजीवोंऔर जंगलों की रक्षा में तैनात सैनिकों ने अपने प्राण त्याग दिए थे। इन बलिदान को याद करने के लिए इस दिन को राष्ट्रीय वन शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है। भारत सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 11सितंबर साल 2013 में राष्ट्रीय वन शहीद दिवस के रूप में मनाए जाने का फैसला किया था। जिसके बाद हर साल 11 सितंबर को राष्ट्रीय वन शहीद दिवस मनाया जाने लगा।

इस दिन देश में कई शैक्षणिक संस्थाएं और संस्थान में कार्यक्रम का आयोजित किया जाता है। कार्यक्रम के माध्यम से लोगों को बड़े पैमाने पर जंगलों, पेड़ों और पर्यावरण की रक्षा के बारे में जानकारी दी जाती है। अधिक से अधिक बच्चों और युवाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए हर साल कई प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं। ताकि, वे जंगलों को बचाने के बारे में जागरुक हो सकें।

राष्ट्रीय वन शहीद दिवस इतिहास

दरअसल, 11सितंबर 1730 में देश में खेजड़ली नरसंहार हुआ था। उस समय जोधपुर के किले का निर्माण चल रहा था। चूने के पत्थरों को जलाने के लिए लकड़ियों की जरूरत थी, इसलिए दीवान गिरधर दास भंडारी ने अपने सैनिकों को अधिक पेड़ वाले गांव खेजड़ली से लकड़ियां लाने का आदेश दिया गया। जब सैनिक पेड़ काटने आगे बढ़े तो अमृता देवी बिश्नोई नाम की एक महिला के नेतृत्व में ग्रामीणों ने अपने पेड़ों को काटने का विरोध किया। अमृता ने कहा कि खेजड़ी के पेड़ बिश्नोइयों के लिए पवित्र हैं।

उन्होंने अपनी आस्था की वजह से पेड़ों को काटने से मना कर दिया। तब अमृता देवी ने पवित्र खेजड़ली के पेड़ के बजाय अपना सिर कटवा दिया। इस हरकत से गुस्साए गांव के लोगों ने इसका विरोध किया तो सैनिकों ने अमृता के बच्चों समेत 350से ज्यादा लोगों को मार डाला। जब इस नरसंहार की सूचना राजा तक पहुंची तो उन्होंने तुरंत अपने सैनिकों को पीछे हटने के लिए कहा और बिश्नोई समुदाय के लोगों से माफी मांगी। इसके अलावा राजा महाराजा अभय सिंह ने एक घोषणा की कि बिश्नोई गांवों के आसपास के क्षेत्रों में पेड़ों की कटाई और जानवरों की हत्या नहीं होगी।

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