जानें कौन थी सबसे पहली करवा चौथ रखने वाली महिला,कहां से शुरू हुई करवा की परंपरा

जानें कौन थी सबसे पहली करवा चौथ रखने वाली महिला,कहां से शुरू हुई करवा की परंपरा

नई दिल्ली: भारत एक संप्रभुता का देश है जहां महिला पुरुष को एक समान क्षेणी में रखा जाता है। कहा जाता है कि “यत्र नार्येस्तु पुज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता”,मतलब जहां नारी का सम्मान किया जाता है वहीं देवता आते है। यही कारण है कि नारायण के साथ लक्ष्मी, शिव के साथ पार्वती, राम के साथ सीता और कृष्ण के साथ राधा की आराधना नारी शक्ति के प्रभाव को उजागर करती है।

ऐसे में करवा चौथ का त्योहार सभी महिलाओं के लिए बहुत खास पर्व होता है इस दिन महिलाएं अपने पति के लिए निर्जल व्रत रख कर लंबी आयु की दुआ करती है। लेकिन क्या आप जानते है ये व्रत कहा से शुरु हुआ ? सबसे पहले इस व्रत को रखने वाली कौन महीला थी?

माना जाता है कि ये व्रत महिलाओं के लिए बेहद खास है और ये व्रत सुहागने अपनी पति की लंबी उम्र के लिए निर्जला व्रत रखती है। इस व्रत की यह परंपरा सदियों से चलती आ रही है। कहते हैं कि यह व्रत देवताओं की पत्नियों ने भी रखा था। और तो और महाभारत काल में भी इस व्रत का प्रसंग मिलता है।

सबसे पहला व्रत

मान्‍यता है कि सबसे पहले यह व्रत शक्ति स्‍वरूपा देवी पार्वती ने भोलेनाथ के लिए रखा था। इसी व्रत से उन्‍हें अखंड सौभाग्‍य की प्राप्ति हुई थी। इसीलिए सुहागिनें अपने पतियों की लंबी उम्र की कामना से यह व्रत करती हैं और देवी पार्वती और भगवान शिव की पूजा करती हैं।

करवा चौथ का व्रत रखने की परंपरा शुरू

कथा में लिखा है कि एक बार देवताओं और राक्षसों के मध्‍य भयंकर युद्ध छिड़ा था। लाख उपायों के बावजूद भी देवताओं को सफलता नहीं मिल पा रही थी और दानव थे कि वह हावी हुए जा रहे थे। तभी ब्रह्मदेव ने सभी देवताओं की पत्नियों को करवा चौथ का व्रत करने को कहा। उन्‍होंने बताया कि इस व्रत को करने से उनके पति दानवों से यह युद्ध जीत जाएंगे। इसके बाद कार्तिक माह की चतुर्थी के दिन सभी ने व्रत किया और अपने पतियों के लिए युद्ध में सफलता की कामना की। कहा जाता है कि तब से करवा चौथ का व्रत रखने की परंपरा शुरू हुई।

महाभारत काल में क्या है महत्तव

महाभारत काल में कथा बताई जाती है कि एक बार अर्जुन नीलगिरी पर्वत पर तपस्‍या करने गए थे। उसी दौरान पांडवों पर कई तरह के संकट आ गए। तब द्रोपदी ने श्रीकृष्‍ण से पांडवों के संकट से उबरने का उपाय पूछा। इसपर श्रीकृष्ण ने उन्‍हें कार्तिक माह की चतुर्थी के दिन करवा का व्रत करने को कहा। इसके बाद द्रोपदी ने यह व्रत किया और पांडवों को संकटों से मुक्ति मिल गई।

 

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