
World Yoga Day: आज विश्व योग दिवस है। हर साल 21 जून को योग दिवस के रुप में मनाया जाता है। योग दिवस की कैसे शुरुआत हुई ये तो आपने कई बार सुना होगा लेकिन क्या आपको पता है योग की पहली महिला गुरु कौन थी? दरअसल, योग की पहली महिला गुरु इंद्रा देवी थी। इनका नाम पढ़ कर आपको लग रहा होगा ये भारतीय हैं। लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी ये भारतीय नहीं बल्कि ये एक विदेशी महिला है जो रशिया से हैं। दरअसल, 12मई 1899को लातविया की राजधानी रीगा में जन्मी इंद्रा देवी का असली नाम यूजिनी पीटरसन था। इंद्रा की मां एक कुलीन घराने की रूसी थीं तो पिता एक स्वीडिश बैंकर थे। 15साल की उम्र में इंद्रा ने योग पर लिखी एक किताब को पढ़कर भारत के प्रति इस कदर मुग्ध हुईं कि भारत आने से वह खुद को रोक नहीं पाईं। यहीं से उन्हें वर्षों पुरानी भारतीय योग पद्धति के बारे में भी पता चला। उनके लिए यह जुड़ाव इतना गहरा हो गया कि महज पंद्रह वर्ष की आयु में ही उन्होंने भारत आने का मन बना लिया था। इसका मकसद था भारत जाकर योग सीखना और सिखाना।
ऐसे पहुंची भारत
जब रूस में गृह युद्ध जैसी हालात पैदा हो गए तो इंद्रा मां के साथ 1917में वहां से भागकर लातविया चली गईं। फिर पोलैंड, जहां उन्होंने एक एक्ट्रैस और डांसर के तौर पर नाम कमाना शुरू किया। 1926में उन्होंने थियोसोफिकल सोसायटी की एक मीटिंग में जिद्दू कृष्णामूर्ति को मंत्रोच्चार करते सुना। संस्कृत मंत्रों का उनके ऊपर ऐसा असर हुआ कि उन्हें कोई ताकत अपने पास बुला रही है। बस उसी दिन से उनका जीवन बदल गया। वो भारत के प्रति मंत्रमुग्ध होती चल गईं।1927में जब एक धनी जर्मन बैंकर हेर्मन बोल्म ने इंद्रा के सामने विवाह-प्रस्ताव रखा, तो उन्होंने हां कह दिया लेकिन, इस शर्त पर कि पहले वह उनकी भारत-यात्रा का ख़र्च उठाएगा। बोल्म की दी हुई सगाई की अंगूठी पहन कर इंद्रा भारत गईं। तीन महीने बाद भारत से लौटते ही उन्होंने बैंकर को अंगूठी लौटा दी। कहा, ‘क्षमा करना, मेरी जगह तो भारत में है।’ इंद्रा ने अपने सारे गहने-ज़ेवर बेचे और एक बार फिर चल पड़ीं भारत की ओर। इंद्रा भले ही भारतीय नहीं थीं, लेकिन भारतीयता उनके मन में बसती थी।भारत पहुंचते ही उन्होंने अपना एक नया नाम रख लिया- इंद्रा देवी। वे बंबई के फ़िल्म जगत में नर्तकी और अभिनेत्री का काम करने लगीं। वहीं, उनका चेकोस्लोवाक वाणिज्य दूतावास के एक अताशी यान स्त्राकाती से परिचय हुआ। 1930 में दोनों ने शादी भी कर ली। अपने पति के माध्यम से ही इंद्रा देवी मैसूर के महाराजा कृष्णराजेंद्र वड़ेयार से मिलीं।योगगुरु तिरुमलाई कृष्णमाचार्य उनके राजमहल में ही योगशिक्षा दिया करते थे। इंद्रा देवी ने जब उनसे कहा कि वे भी उनसे योगसाधना सीखना चाहती हैं, तो कृष्णमाचार्य ने यह कह कर मना कर दिया कि वे एक विदेशी और महिला हैं। मैसूर के महाराजा कृष्णराजेंद्र वड़ेयार के अनुरोध करने पर ही मशहूर योग गुरू कृष्णमाचार्य ने उन्हें छात्रा के रूप में स्वीकार किया। मैसूर पैलेस की योगशाला में योग सीखने वाली वो पहली विदेशी महिला थीं।योग सीखने के बाद 1938 में पति के साथ वो शंघाई चली गईं। द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त होने तक वे शंघाई में ही रहीं। इस दौरान वे चीन के राष्ट्रवादी नेता च्यांग काइ-शेक की पत्नी के घर में योगशिक्षा का स्कूल चलाने लगीं। चीन में यह पहला योग स्कूल था। युद्ध के अंत के बाद वे एक बार फिर भारत लौटीं।
रहीं प्रेरक शिक्षक
इंद्रा देवी एक प्रेरक शिक्षक और योग के इतिहास में एक महत्वपूर्ण व्यक्ति थीं। उनके काम ने योग के अभ्यास को दुनिया भर में फैलाने और इसे सभी के लिए सुलभ बनाने में मदद की। वह एक सच्ची शिक्षिका थीं और उन सभी के लिए प्रेरणा थीं जो उन्हें जानते थे। उनकी विरासत उनके छात्रों और उन लोगों के माध्यम से जीवित रहेगी जो आज भी योग का अभ्यास कर रहे हैं।
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