03 October Jitiya Vrat: जैसे एक सुहागिन महिला अपने पति की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए करवा चौथ का व्रत रखती है। ठीक वैसे ही एक मां अपने बच्चों की तरक्की, लंबी आयु और उन्हें बुरी नजर से बचाने के लिए जितिया का व्रत रखती है, जिसे जीवित्पुत्रिका व्रत या जिउतिया भी कहते हैं। यह व्रत हर साल आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। ये व्रत सबसे कठिन माना जाता है, क्योंकि इस दिन सभी माताएं 24 घंटे तक निर्जला व्रत में रहती है, यानी इस अवधि में वह अन्न-जल ग्रहण नहीं कर सकती है। तो चलिए जितिया व्रत की सही तारीख, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि के बारे में जानते है।
जितिया व्रत की सही तारीख
द्रिक पंचांग के अनुसार, आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन जितिया का व्रत रखा जाता है। इस तिथि की शुरूआत 03 अक्टूबर की सुबह करीब 7:59 बजे होगा और समापन अगले दिन 04 अक्टूबर की सुबह करीब 5:51 बजे होगा। हालांकि, इस व्रत की शुरूआत नहाय-खाय के होती है, जो 02 अक्टूबर को किया जाएगा। इस दिन स्नान के बाद सात्विक भोजन लिया जाता है। इसके बाद 03 अक्टूबर की सुबह सूरज निकलने से पहले सरगी यानी हल्का भोजन किया जाता है। इसके बाद निर्जला व्रत शुरू होता है। उदया तिथि के आधार पर 03 अक्टूबर को ही जितिया का व्रत रखा जा रहा है, जो इसी दिन मुख्य व्रत और पूजा का प्रावधान है। लेकिन व्रत का पारण अगले दिन 04 अक्टूबर को अष्टमी तिथि के खत्म होने पर ही किया जाएगा।
Also read: Horoscope Today 2 October 2026, Aaj Ka Rashifal: किस राशि के लिए रहेगा शुभ दिन और किसे बरतनी होगी सावधानी? जानें पूरा हाल
जितिया व्रत का शुभ मुहूर्त
ब्रह्म मुहूर्त - 04:38 AM से 05:26 AM
अभिजित मुहूर्त - 11:46 AM से 12:34 PM
विजय मुहूर्त - 02:08 PM से 02:56 PM
गोधूलि मुहूर्त - 06:05 PM से 06:29 PM
मुख्य पूजा - 06:05 PM से 08:29 PM
जितिया व्रत की पूजा सामग्री
जितिया के व्रत के लिए जीमूतवाहन की मूर्ति या फोटो, मिट्टी या गोबर से बनी चील की प्रतिमा और सियारिन, पीला या लाल वस्त्र, चौकी, कलश, गंगाजल, अक्षत, रोली, सिंदूर, मौली, कुशा, दीपक, धूप, कपूर, फूल, फल, पंचामृत, बांस की टोकरी, जनेऊ और जिउतिया का धागा जैसी पूजा सामग्री की जरूरत होगी। इसके अलावा प्रसाद के लिए केला, बताशे या ठेकुआ, हलवा।
जितिया व्रत की पूजा-विधि
1. सबसे पहले ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें।
2. इसके बाद मंदिर की सफाई करें और चौकी लगाकर उस पर पीला या लाल का कपड़ा बिछाएं।
3. फिर चौकी पर जीमूतवाहन की मूर्ति या फोटो रखें और गंगाजल छिड़के और संतान की दीर्घायु का संकल्प लें।
4. इसके बाद भगवान गणेश का स्मरण करें और जल, अक्षत, फूल, धूप और दीप अर्पित करें।
5. फिर आरती करें और व्रत कथा सुनें।
6. इसके बाद बच्चों की कलाई पर मौली या जिउतिया का धागा बांधें।