
Eid-ul-Fitr called Meethi Eid: रमजान के पवित्र महीने के समापन पर मनाई जाने वाली ईद-उल-फितर को भारत समेत दक्षिण एशिया में प्यार से ‘मीठी ईद’ भी कहा जाता है। यह नाम सिर्फ मिठाइयों की वजह से नहीं, बल्कि रमजान के त्याग, संयम और आध्यात्मिक शुद्धि के बाद मिलने वाली ‘मीठी’ खुशी और इनाम का प्रतीक है। इस बार ईद 20या 21मार्च को चांद दिखने पर मनाई जाएगी।
ईद-उल-फितर का इतिहास
ईद-उल-फितर का शाब्दिक अर्थ है ‘रोजा तोड़ने का त्योहार’। रमजान के 29या 30दिनों तक सुबह से सूर्यास्त तक रोजा रखने के बाद यह दिन अल्लाह का शुक्र अदा करने, बख्शिश पाने और भाईचारे को मजबूत करने का अवसर होता है। ईद की शुरुआत पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के समय मदीना में हुई। यह पहली बार हिजरी संवत 2 (624ईस्वी) में मनाई गई। वहीं, कुछ मान्यताओं के अनुसार, पैगंबर साहब के समय में जंग-ए-बद्र (624ईस्वी) की विजय के बाद जीत की खुशी में मिठाई बांटी गई थी, जिसकी याद में यह परंपरा चली आ रही है।
पैगंबर ने बताया कि अल्लाह ने अपने बंदों के लिए दो खुशी के दिन तय किए हैं - ईद-उल-फितर और ईद-उल-अजहा (बकरीद)। रमजान में रोजा, कुरान की तिलावत, तरावीह नमाज और इबादत से आत्मा शुद्ध होती है, और ईद उस इबादत का इनाम है।
‘मीठी ईद’ नाम क्यों पड़ा?
इस नाम के पीछे मुख्य कारण रमजान के बाद मिठाइयों का सेवन और बांटना है। पूरे महीने रोजे के दौरान मुंह में कुछ भी नहीं जाता, इसलिए ईद के दिन सबसे पहले मीठा खाकर मुंह मीठा करने की परंपरा है। घरों में विशेष रूप से शीर खुरमा (दूध, सेवई, खजूर और ड्राई फ्रूट्स वाली मिठाई), सेवइयां, खीर, फिरनी और अन्य मीठे पकवान बनाए जाते हैं। इन मिठाइयों को परिवार, रिश्तेदारों, पड़ोसियों और गरीबों में बांटा जाता है, जो खुशी और प्रेम को बढ़ाता है।
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