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'बुजुर्गों की अनदेखी सभ्यता के लिए खतरा', जस्टिस सूर्यकांत ने क्यों दी ऐसी चेतावनी?

'बुजुर्गों की अनदेखी सभ्यता के लिए खतरा', जस्टिस सूर्यकांत ने क्यों दी ऐसी चेतावनी?

Justice Suryakant On Elderly Rights:सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस सूर्यकांत ने देश में बढ़ती बुजुर्गों की उपेक्षा पर गहरी चिंता जताई है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि बुजुर्गों की अनदेखी जारी रही तो यह हमारे समाज और सभ्यता के लिए एक बड़ा भूचाल साबित हो सकता है। दरअसल, यह बयान उन्होंने माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के रखरखाव एवं कल्याण अधिनियम (MWPSC Act) पर आयोजित एक विशेष सत्र में दिया, जहां केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री वीरेंद्र कुमार, सामाजिक न्याय सचिव अमित यादव समेत कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

क्या है पूरा मामला?

बता दें, यह कार्यक्रम 17 नवंबर 2025 को आयोजित किया गया, जिसमें जस्टिस सूर्यकांत ने पीढ़ियों के बीच कमजोर होते रिश्तों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आधुनिकता और प्रवास के कारण समृद्धि ने निकटता की जगह ले ली है, जिससे पीढ़ियों के बीच दरवाजे बंद हो रहे हैं। उन्होंने कहा 'समृद्धि ने चुपचाप निकटता की जगह ले ली है। प्रवास ने काम के नए अवसर खोले हैं, लेकिन पीढ़ियों के बीच दरवाजे बंद कर दिए हैं।' जस्टिस सूर्यकांत के अनुसार, भारतीय समाज में बुजुर्गों को हमेशा सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था, जहां उम्र बढ़ना एक उत्थान की तरह था और वे परिवार की अंतरात्मा होते थे। लेकिन अब ये संरचनाएं कमजोर हो रही हैं, जो हमें इंसान बनाए रखने वाली पुरानी दुनिया को खोने का खतरा पैदा कर रही हैं।

उन्होंने बुजुर्गों के सामने आने वाली चुनौतियों का जिक्र किया, जैसे भावनात्मक परित्याग, डिजिटल ठगी, सामाजिक अलगाव और लंबी चलने वाली मुकदमेबाजी। एक उदाहरण देते हुए उन्होंने एक विधवा महिला का मामला बताया, जिसने लगभग पांच दशकों तक रखरखाव के लिए लड़ाई लड़ी। सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत उसके संपत्ति अधिकार बहाल किए, क्योंकि 'न्याय तकनीकी सही होने से ज्यादा मांग करता है और गरिमा की प्रतिज्ञा उम्र के साथ समाप्त नहीं होती।'

जस्टिस सूर्यकांत ने की अपील

जस्टिस सूर्यकांत ने राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA), राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों, पुलिस, सामाजिक कल्याण अधिकारियों और सामाजिक न्याय मंत्रालय के बीच बेहतर समन्वय की मांग की, ताकि इस तरह के विवाद अदालत पहुंचने से पहले ही सुलझाए जा सकें। इसी के साथ उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे बुजुर्गों और नए के बीच पुल बनें – डिजिटल सिस्टम में मदद करें, जरूरत पड़ने पर साथ दें और सुनिश्चित करें कि कोई बुजुर्ग कतार में अकेला न खड़ा हो। "भारत का भविष्य बुजुर्गों के साथ गरिमापूर्ण व्यवहार पर निर्भर करता है," उन्होंने कहा।

इसके अलावा केंद्रीय मंत्री वीरेंद्र कुमार ने भारत की ऐतिहासिक परंपरा का हवाला देते हुए कहा कि वृद्धाश्रम की अवधारणा पश्चिमी विचार है, जो हमारी पूर्वी संस्कृति का हिस्सा नहीं थी। उन्होंने माउंट आबू के एक वृद्धाश्रम का उदाहरण दिया, जहां डॉक्टर, वकील और इंजीनियर जैसे शिक्षित पेशेवर अकेले रहते हैं, जबकि उनके बच्चे विदेश में हैं। उन्होंने आगे कहा 'पैसा जरूरी है, लेकिन पैसा सब कुछ नहीं है।' मंत्री ने उन मामलों का जिक्र किया जहां बुजुर्ग माता-पिता संपत्ति बच्चों को सौंप देते हैं, लेकिन बाद में उपेक्षा का शिकार होते हैं, फिर भी कई मांएं बेटे के खिलाफ मुकदमा नहीं करना चाहतीं। उन्होंने कानूनी सुरक्षा के साथ-साथ सहानुभूति की आवश्यकता पर बल दिया।  

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