
CJI Suryakant On Democracy: भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने संविधान की मजबूती को समझाने के लिए एक अनोखी स्वदेशी मिसाल दी है। उन्होंने संविधान को पारंपरिक 'चारपाई' से जोड़ते हुए कहा कि इसका ढांचा मजबूत है, पैर दृढ़ हैं, लेकिन रस्सियों की बुनाई ऐसी है जो कड़क और लचीली दोनों का संतुलन बनाती है। यह उदाहरण उन्होंने न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में दिया, जहां उन्होंने केशवानंद भारती मामले का जिक्र करते हुए संविधान की बुनियादी संरचना के सिद्धांत को फिर से खोजने जैसा बताया। इस मिसाल ने संविधान की स्थिरता और अनुकूलनशीलता को सरल तरीके से समझाया, जो लोकतंत्र की नींव को मजबूत बनाती है।
सम्मेलन के दौरान क्या बोले CJI सूर्यकांत?
दरअसल, यह बयान सोनीपत के ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में 'न्यायपालिका की स्वतंत्रता: तुलनात्मक दृष्टिकोण' नामक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में दिया गया। सम्मेलन का उद्घाटन CJI सूर्यकांत ने किया, जिसमें केंद्रीय कानून राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल मुख्य अतिथि थे। कार्यक्रम में ब्राजील के मुख्य न्यायाधीश और ब्रिटेन के एक सांसद समेत कई न्यायाधीश, वकील, शिक्षाविद और छात्र भी शामिल हुए। सम्मेलन में 1973के ऐतिहासिक केशवानंद भारती मामले का नाटकीय पुन:अभिनय भी किया गया, जिसमें 13सुप्रीम कोर्ट जजों ने हिस्सा लिया, साथ ही अटॉर्नी जनरल, सॉलिसिटर जनरल और वरिष्ठ वकीलों ने मूल मामले की तरह बहस की।
मजबूती और लचीलापन का संतुलन - CJI सूर्यकांत
इस दौरान CJI ने संविधान की बुनियादी संरचना को चारपाई से जोड़ा। उन्होंने कहा कि चारपाई का फ्रेम मजबूत होता है, उसके पैर स्थिर, लेकिन रस्सियां अगर बहुत कड़ी बांधी जाएं तो दबाव में टूट सकती हैं और अगर ढीली रहें तो ढांचा झुक सकता है। इसी तरह संविधान का पाठ फ्रेम है, संस्थाएं उसके पैर और शासन की नैतिक अनुशासन रस्सियां हैं। यह संतुलन संविधान को टिकाऊ बनाता है। उन्होंने इसे संवैधानिक 'खाट' की बुनाई से जोड़ा, जो कठोरता और लचीलेपन का मेल है। इस स्वदेशी उदाहरण से उन्होंने समझाया कि कैसे लोकतंत्र झुकता है लेकिन टूटता नहीं, और न्यायपालिका इसमें संतुलन बनाए रखती है।
बुनियादी संरचना सिद्धांत पर विचार
केशवानंद भारती मामले पर बोलते हुए CJI ने कहा कि यह सिद्धांत कोई नई खोज नहीं, बल्कि पहले से मौजूद सिद्धांतों की फिर से पहचान है। इस फैसले ने तय किया कि संसद संविधान की मूल विशेषताओं जैसे लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, संघवाद, कानून का शासन और न्यायिक समीक्षा को बदल नहीं सकती। उन्होंने इसे संवैधानिक परिपक्वता का प्रमाण बताया, जहां शक्ति सिद्धांतों के प्रति जवाबदेह रहती है। CJI ने जोर दिया कि यह सिद्धांत संसद और न्यायपालिका के बीच संतुलन बनाता है, और लोकतंत्र की रक्षा करता है
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