
तारीख 25 जून सन् 1975...जब इंदिरा ने देश में इमरजेंसी लगाने का ऐलान किया। आज ही के दिन यानी 25 जून से 21 महीने के लिए देश में इमरजेंसी लागू हो गई थी। देश के लोगों को रेडियो के जरिए इमरजेंसी की खबर सुनाई गई। आपातकाल के ऐलान के साथ ही नागरिकों के मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए थे।
25 जून की रात नेताओं की गिरफ्तारी
25 जून की रात से ही देश में विपक्ष के नेताओं की गिरफ्तारियों का दौर शुरू हो गया था। जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, जॉर्ज फर्नाडीस सरीखे बड़े नेताओं को जेल में ठूंस दिया गया था। जेलों में जगह तक नहीं बची थी। उस वक्त सरकार के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को दबा दिया गया था।
मीडिया पर लग दी थी सेंसरशिप
मीडिया पर सेंसरशिप लगा दी गई। देश की जनता को अगले दिन सुबह जब अखबार नहीं मिले, तब जाकर इस सच्चाई आम लोगों तक पहुंची कि देश में इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगा दी है। कई अखबार सेंसरशिप के विरोध में या प्रशासन द्वारा व्यवधान के कारण प्रकाशित ही नहीं हुए। तरह-तरह की अफवाहें उड़ने लगीं।
आपातकाल के बाद प्रशासन और पुलिस के भारी उत्पीड़न की कहानियां सामने आई थीं। प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई थी। हर अखबार में सेंसर अधिकारी बैठा दिया गया। उसकी अनुमति के बाद ही कोई समाचार छप सकता था। सरकार विरोधी समाचार छापने पर गिरफ्तारी हो सकती थी। यह सब तब थम सका, जब 23 जनवरी, 1977 को मार्च महीने में चुनाव की घोषणा हो गई। आज अतीत में 25 जून का दिन लोकतंत्र के काले अध्याय के रूप में ही दर्ज है।
क्यों लगाई गई थी इमरजेंसी
लालबहादुर शास्त्री के निधन के बाद देश की प्रधानमंत्री बनीं इंदिरा गांधी का कुछ कारणों से न्यायपालिका से टकराव शुरू हो गया था। यही टकराव इमरजेंसी की पृष्ठभूमि बना था। आपातकाल के लिए 27 फरवरी, 1967 को आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने बड़ी पृष्ठभूमि तैयार की। एक मामले में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सुब्बाराव के नेतृत्व वाली एक खंडपीठ ने सात बनाम छह जजों के बहुमत से फैसला सुनाया था। इसमें कहा था कि संसद में दो तिहाई बहुमत के साथ भी किसी संविधान संशोधन के जरिये मूलभूत अधिकारों के प्रावधान को न तो खत्म किया जा सकता है और न ही इन्हें सीमित किया जा सकता है।
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