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बिहार चुनाव से पहले सुप्रीम कोर्ट का ECI को निर्देश, वोटर्स के लिए खोला कानूनी मदद का रास्ता

बिहार चुनाव से पहले सुप्रीम कोर्ट का ECI को निर्देश, वोटर्स के लिए खोला कानूनी मदद का रास्ता

SC On SIR Controversy: बिहार विधानसभा चुनावों से ठीक पहले सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है। नाम हटाए गए वोटर्स को मुफ्त कानूनी मदद प्रदान करने का निर्देश देते हुए कोर्ट ने चुनाव आयोग (ईसीआई) को पारदर्शिता और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की अखंडता सुनिश्चित करने का आदेश दिया है। यह निर्देश बिहार के विशेष गहन संशोधन (स्पेशल इंटेंसिव रिविजन - SIR) अभियान के तहत ड्राफ्ट और फाइनल वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने की विवादास्पद प्रक्रिया के संदर्भ में आया है। कोर्ट ने कहा कि अपील दाखिल करने का समय कम बचा है, इसलिए तत्काल सहायता उपलब्ध कराई जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

बता दें, 09अक्टूबर को जस्टिस सूर्या कांत और जस्टिस ज्योमाला बागची की बेंच ने सुनवाई के दौरान अंतरिम आदेश जारी किया। कोर्ट ने बिहार स्टेट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (BSLSA) के एक्जीक्यूटिव चेयरमैन को तत्काल निर्देश देने को कहा कि सभी डिस्ट्रिक्ट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (DLSA) के सचिवों को सूचित करें। इनमें पैरालीगल वॉलंटियर्स और मुफ्त कानूनी सहायता वकीलों की सेवाएं उपलब्ध कराने का प्रावधान है, ताकि हटाए गए वोटर्स अपनी अपीलें आसानी से दाखिल कर सकें। कोर्ट ने स्पष्ट कहा 'अपील दाखिल करने का समय समाप्त होने वाला है, इसलिए आज ही संचार भेजा जाए।'

इसके अलावा कोर्ट ने DLSA के सचिवों को निर्देश दिया कि प्रत्येक गांव में पैरालीगल वॉलंटियर्स के मोबाइल नंबर और पूर्ण विवरण को तुरंत फिर से अधिसूचित करें। सुनवाई के दौरान ईसीआई ने बताया कि फाइनल लिस्ट में जोड़े गए अधिकांश नाम नए वोटर्स के हैं और अब तक कोई अपील या शिकायत दर्ज नहीं हुई। हालांकि, याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि 3.66लाख हटाए गए वोटर्स को व्यक्तिगत नोटिस या कारण नहीं बताए गए, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।

कोर्ट ने ECI से 3.66 लाख डिलीटेड वोटर्स की विस्तृत जानकारी भी मांगी, जिसमें यह स्पष्ट किया जाए कि फाइनल लिस्ट में जोड़े गए नाम ड्राफ्ट से री-इनक्लूडेड हैं या पूरी तरह नए। जस्टिस बागची ने कहा 'यह भ्रम की स्थिति है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में पारदर्शिता आवश्यक है।' इसके अलावा कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से 100-200 प्रभावित व्यक्तियों के हलफनामे पेश करने को कहा, ताकि फैसला निष्पक्ष रुप से लिया जा सकें। जस्टिस कांत ने कहा 'बिहार भारत का हिस्सा है। अगर दस्तावेज नहीं हैं, तो अन्य राज्यों में भी नहीं होंगे, लेकिन नागरिकता साबित करने का कोई माध्यम होना चाहिए।'

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