श्रीकृष्ण को क्यों प्रिय थी बांसुरी, माखन और मोरपंख, जानें

श्रीकृष्ण को क्यों प्रिय थी बांसुरी, माखन और मोरपंख, जानें

नई दिल्ली: जन्माष्टमी के पावन पर्व को बड़े धूम-धाम के साथ पूरे देशभर में मनाया जा रहा है। वहीं हिंदू मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु के आठवें अवतार श्रीकृष्ण ने धरती पर जन्म लिया था। शास्त्रों में श्रीकृष्ण की महिमा को लेकर काफी कुछ कहा गया है। मान्यताओं के मुताबिक कन्हैया लाल को मुरली, माखन , सिर पर मोरपंख धारण करना बेहद पसंद है। लेकिन क्या अपने कभी सोचा है कि श्री कृष्ण को यही सारी चीजें क्यों पसंद थी? आज हम आपको इस से जुड़ी कुछ रोच्क बातें बताने आए है।

बांसुरी

दरअसल, नन्हें कान्हा से लेकर द्वारकाधीश बनने तक उनकी कई लीलाओं का वर्णन किया गया है। लेकिन वास्तव में श्रीकृष्ण की कोई भी लीला सामान्य नहीं थी, उनकी हर लीला के ​पीछे कोई न कोई उद्देश्य छिपा होता था। वही ऐसा कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्णा प्रेमपूर्वक मग्न होकर इतनी मधुर बांसुरी बजाते थे कि बांसुरी की धुन सुनकर लोग अपनी सुधबुध खो देते थे। लेकिन वास्तव में श्रीकृष्ण के बांसुरी बजाने का उद्देश्य कुछ और था। दरअसल बांसुरी ख़ुशी और आनंद का प्रतीक है, इसका मतलब है कि चाहे हालात जो भी हों, आप हमेशा खुश रहें और मन को आनंदित रखकर दूसरों में भी खुशियां बांटें। जिस तरह कान्हा बांसुरी बजाकर खुद भी खुश रहते थे और दूसरों को खुशी देते थे।

मोरपंख

मोरपंक में कई तरह के रंग समाहित होते है। वही यह रंग जीवन के हालातों को दर्शाते है। बता दें कि,मोरपंख का गहरा रंग दुख का प्रतिक होता है तो वही हल्का रंग सुख और शांति का प्रतिक होता है। इसका सीधा-सीधा मतलब है कि व्यक्ति को जीवन में सुख और दुख दोनों का ही अनुभव करना पड़ सकता है। इसके अलावा मोर एक मात्र ऐसा प्राणी है जो पूरे जीवन काल ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करता है। साथ प्रेमपूर्वक अपने आप में मस्त रहता है। ऐसे में मोरपंख परिशुद्ध प्रेम यानी प्रेम में ब्रह्मचर्य की महान भावना को प्र​दर्शित करता है।

माखन

वही श्री कृष्ण को माखन चोर भी कहा जाता था क्यों कि वह अपने बाल्यकाल में माखन चुराकर खाना बेहद पसंद करते थे। बता दें कि, उस समय कंस लोगो को प्रताड़ित करने के लिए टैक्स के रूप में लोगों से ढ़ेर सारा दूध,माखन,घी आदि वसूला करता था। इस अन्याय को रोकने के लिए श्रीकृष्ण अपने ग्वालों के साथ मिलकर माखन की मटकी फोड़ देते थे और सारे ग्वालों के साथ मिलकर खा लेते थे क्योंकि उन्हें ऐसा मानना था कि माखन के असली हकदार ब्रज के लोग है और उन्हें टैक्स नही देना चाहिए।

 

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